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कम्युनिज्म [लघुकथा] - सआदत हसन मंटो

वह अपने घर का तमाम ज़रूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था कि रास्ते में लोगों ने उसे रोक लिया।

एक ने ट्रक के सामान पर नज़र डालते हुए कहा, "देखो यार! किस मज़े से इतना माल अकेला उड़ाए चला जा रहा है।"

सामान के मालिक ने कहा, "जनाब! माल मेरा है।"

दो तीन आदमी हँसे, "हम सब जानते हैं।"

एक आदमी चिल्लाया, "लूट लो! यह अमीर आदमी है, ट्रक लेकर चोरियाँ करता है।"

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मंटो की कहानियाँ इतिहास के दस्तखत हैं। वे वर्तमान को भी आईना दिखाने में सक्षम हैं। - साहित्य शिल्पी।

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3 टिप्पणियां

  1. सही कहा गया है |

    साहित्य शिल्पी को इसे बांटने के लिए धन्यवाद ! ऐसे और शुरुवात की जरुरत है |

    सस्नेह
    Avanaeesh

    जवाब देंहटाएं
  2. Samaj ke vidrohi ang ki disha darshati yeh laghukatha apna safar poora kar rahi
    Sahityashilpi ke manadl ko dhnaywaad ise padwane ke liye

    जवाब देंहटाएं
  3. आज भी बारीकी से देखो तो कम्युनिज्म का यही चेहरा है इसके आगे कुछ नहीं।

    जवाब देंहटाएं

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