दादीजी का चश्मा

दादीजी का चश्मा खोया ,
सबकी आफत आई .
सब मिल खोज रहे हैं फिर भी
पड़ा नहीं दिखलाई .
दादी अपने सर पर देखो ,
मीना जब चिल्लाई .
राम राम फिर गजब हो गया
दादीजी शरमाई .

***

दूध का कमाल

पीकर गरम गरम दुद्धू ,
बुद्धू नहीं रहा बुद्धू .
खुले अकल के ताले सब,
नहीं अकल के लाले अब .
सुनकर अब अटपटे सबाल ,
खड़े न होते सिर के बाल .
हर जबाब अब उसके पास ,
सब उससे कहते शाबाश .

--
डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
सुभाष नगर , शाहजहाँपुर,
उत्तर प्रदेश (भारत) - 242001.

4 comments:

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