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दिशा निर्धारण [कविता] - श्रीप्रकाश शुक्ल

ऋषि मुनियों की पावन भू पर
धन्य हुए हम जीवन पाकर
सार्थक मूल्यों के आँचल ने
बढा किया सब को दुलराकर

जिस जगती पर गर्व हमें था
सच्चे, शुचि व्यवहारों का
आज वहां पर जमघट दिखता
चोर, उचक्के, आवारों का

छीन रहे इस भू के जाए
खुद अपनों के शांति और सुख
लूट खसोट और अर्थ परिग्रह
जीवन के उद्देश्य प्रमुख

सत्ता के मैले हाथो से
हाथ मिला पा रहे सहारा
इनकी गतिविधियां शर्मनाक
घर समाज आतंकित सारा

भद्र, प्रतिष्ठित,समाज सेवी,
शासन के प्रतिनिधि, संरक्षक
माया की लोलुपता में फंस
आज बन गए समाज भक्षक

कहाँ खोगये मूल्य हमारे
कहाँ खो गयीं निधियां शाश्वत
पाश्चात्य हवाओं के झोंकों से
संभवतः हम हुए पदच्युत

अभी समय है, खोज स्वयं को
दिशा एक निर्धारित करलें
पंक्ति अंत में खड़े हुए जो
उनके संरक्षण का प्रण लें

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2 टिप्पणियाँ

  1. अभी समय है, खोज स्वयं को
    दिशा एक निर्धारित करलें
    पंक्ति अंत में खड़े हुए जो
    उनके संरक्षण का प्रण लें


    सुंदर...भाव...और सुंदर शब्द चयन....बधाई आपको श्रीप्रकाश जी...

    जवाब देंहटाएं

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