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राम भरोसे [लघुकथा] - बलराम अग्रवाल

"इका गजब क'अत है।" बेकाबू होते जा रहे रामभरोसे के हाथों से कुल्हाड़ी छीनने का प्रयास करता रामआसरे गिड़गिड़ाया-- " पंडित क मारि कै परलोक न बिगाड़ ।"

"महापंडित रावण को मारने पर राम का परलोक नहीं बिगड़ा …।"

ऊँची आवाज में रामभरोसे चिल्लाया - " तब इस महामूरख को मारने से मेरा परलोक क्यों बिगड़ेगा-अं। "

"उ तो राजा रहे बिटवा - कानून बनान वारे । "

"जिस पंडित ने बहना को छुआ है काका …अपनी बिरादरी के सामने आज वह चमार बनेगा - या परलोक जाएगा ।"

खून उतरी आँखो वाले रामभरोसे काका को झटका देकर एक बार फिर बाहर निकल जाने की कोशिश की तो घर की औरतो और बच्चों के बीच कुहराम कुछ और तेज हो गया ।

"जन्मते ही मर काहे न गई करमजली ।" रामभरोसे की माँ ने अन्दर अपनी बेटी को पीटना - कोसना शुरु कर दिया - "पंडित मरि गवा तो ब्रह्महत्या अलग , बदनामी अलग्…फाँसी अलग ।"

क्रोधित रामभरोसे के हाथो पंडित की सम्भावित हत्या के परिणाम की कल्पना मात्र से रामआसरे टूट - सा गया ।

"कुल्हाडी फेंक द बिटवा! वह फूट पडा -"पंडित क मारे का पाप मत लै। उ अपनी ही बेटी क हाथ पकडा है । तोहार बहना तोहार माँ के साथ उ के अत्याचार का ही फल है भैया । उक नरक जरुर मिलि है । " ' नरक ! ' कुल्हाडी पर रामभरोसे की पकड कुछ और मजबूत हो गई। यह पंडित आज के बाद इस धरती पर् साँस नहीं लेगा - उसने निश्चय किया… और आज ही बिरादरी को वह सुना देगा कि आगे से कोई भी अपने बच्चे का नाम रामभरोसे या रामआसरे न रखे ।

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3 टिप्पणियाँ

  1. अंदर तक झकझोड़ने वाली लघुकथा। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    बालिका दिवस
    हाउस वाइफ़

    जवाब देंहटाएं
  2. निधि जी से सहमत हूँ...
    विचारोतेजक लघुकथा है...बधाई...

    जवाब देंहटाएं

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