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अज्ञात शव [लघुकथा] - संजय जनांगल


रोड़ पर टूटते कीमती सामान और बंद होती दुकानोँ के शटर को देखकर एक बुढ़िया को फुटपाथ पर बेचने के लिए सजाये हुए खिलौनो का भय सताने लगा। उम्र के आखिरी पड़ाव पर पहुंची बुढ़िया बस इन खिलौनो के सहारे ही जीवन काट रही थी। एकदम फटी सी आंखो से एक नौजवान युवक से पूछा, ''बेटा, क्या हुआ ? आज तो कोई भी हड़ताल नहीं है, फिर लोग उत्पात क्योँ मचा रहे हैं ?'' युवक ने बुढ़िया को बताया कि ''कुछ लोग अपनी मांगो को मनवाने के लिए धरने पर बैठे हैं और कुछ लोग इस धरने के समर्थन में दुकानोँ को बंद करवाने में लगे हुए हैं।'' बुढ़िया समझ चुकी थी कि आज भी भूखा सोना पड़ेगा। अपने खिलौनों को इकट्‌ठा कर ही रही थी कि अचानक एक पत्थर उस बूढ़ी औरत के सिर पर लगा और खून से लथपथ सड़क पर चौबीस घण्टे पड़े रहने के बाद उस बूढ़ी औरत को अज्ञात शव की कैटेगरी में रख दिया गया।

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