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अपने-अपने स्थान पर [कविता] - शशांक मिश्र "भारती"



पहाड़-
जहां ऊँचाई का प्रतीक हैं
खाई गहराई का
एक अत्यन्त ऊँचा है
दूसरा अत्यन्त नीचा,
न पहाड़  बनता है अचानक
और न ही खाई
पहाड़  को गर्व है अपने
ऊँचे होने पर
तो खाई को अपनी गहराई पर
एक लम्बी परम्परा- इतिहास है 
दोनों के निर्माण के लिए
लेकिन-
दोनो ही विकल्प हैं
एक-दूसरे का
दोनों ही स्थिर संतुष्ट हैं
अपने-अपने स्थान पर
अपनी ही स्थिति में
अडिग अंगद के पांव सा 
भूत से वर्तमान और भविष्य तक।

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