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पंडित और वेटर [लघुकथा] - अवनीश तिवारी

अंकुर देर शाम अपनी पत्नी रमा और ४ साल की बेटी परी के साथ सैर करने निकले | लगभग २ घंटों के सैर से थकी , रमा ने रात का खाना ना बनाने और होटल में ही खाने की अपनी बात पर जोर दिया |

पत्नी के जिद का शिकार हुए अंकुर ने स्कूटर को पूजा होटल की राह पर मोड़ दिया |
होटल से २० कदम दूर ही स्कूटर खडी कर जब अंकुर आगे बढ़ा तो पास के मंदीर पर उसकी नजर पडी |

पत्नी से कहा , " चलो, आज सोमवार शिवालय में दर्शन कर लें | "
सपरिवार मंदिर में शिव पिंड के दर्शन कर, जब पंडित जी के पास पहुंचे तो पंडित ने सब के हाथों पर रक्षा की डोर बाँध , माथे तिलक लगा, आशीर्वाद के कुछ शब्द बुदबुदाये |
श्रद्धा ने सभ्यता को जगा दिया | विनम्रता से अंकुर ने ज्यों ५१ रूपये निकाल पंडित को देने बढे , कि रमा ने कोहनी से छूते हुए टोका, " ११ दीजिये, ५१ की क्या जरुरत है | "
रमा की लालच ने अंकुर की सभ्यता को जीत लिया और ११ रूपये ही पंडित को मिले |
होटल में खाने में कई लाजवाब डिश मंगाए गए | कुलाचा, पनीर - कढ़ाही, काश्मिरी पुलाव, पापड ... |
जब बिल की बारी आयी तो मानो ४५० रूपये का आंकड़ा खींस निपोरते अंकुर को चिढा रहा था |
शान सौकत के दबाव में जब अंकुर ने २५ रूपये निकाल वेटर को टिप्स देते हुए थेंक यू कहा, तो बेटी परी चिला उठी, " पापा, पापा, ११ दो , पंडित को भी इतना ही दिया ना "|
रमा ने परी के बांयें हाथ को पकड़ दबाया और आँखों के इशारे से अंकुर को २५ रूपये के साथ आगे बढ़ने की अनुमति दी |
होटल से निअकलते ही, पास के उस मंदिर के घंटे की आवाज से अंकुर का दिल फट सा गया और रमा मुंह में माउथ फ्रेशनर भरे स्कूटर पर बैठ गयी |

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