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जम्हूरियत की राह पर सब शख्स चल दिये.. [ग़ज़ल] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


ताउम्र मुझे मारने की कोशिश में वो रहे...
हमने भी की है जिद मगर उसको बचाने की ।

जज्बात से यूं खेलना भाया उसे बहुत ...
शब्दों ने की है जिद मगर उसको बताने की

ये इश्क या जूनून कोई रंज है न ’कान्त’
हमने भी की है जिद मगर उसको मनाने की।

जलसे में आये लोग कन्दील बुझते चल दिये
हमने भी की है जिद मगर उसको जलाने की ।

यूं जम्हूरियत की राह पर सब शख्स चल दिये..
बस मदहोश की है जिद मगर उसको मिटाने की

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10 टिप्पणियाँ

  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (16.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  2. ये इश्क या जूनून कोई रंज है न ’कान्त’
    हमने भी की है जिद मगर उसको मनाने की।

    बेहद सुन्दर रचना.........
    शुभकामनाओं सहित....
    बधाई.....

    जवाब देंहटाएं
  3. ये इश्क या जूनून कोई रंज है न ’कान्त’
    हमने भी की है जिद मगर उसको मनाने की।


    वाह....
    क्या बात है....
    आभार और बधाई .... आपको श्रीकांत जी....

    जवाब देंहटाएं
  4. ताउम्र मुझे मारने की कोशिश में वो रहे...
    हमने भी की है जिद मगर उसको बचाने की ।
    ati sunder
    badhai
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  5. prabhavee kathya... lay men sudhar ho to sone men suhaga hoga.

    जवाब देंहटाएं

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