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लोक पाल बिल [कविता] - डॉ. वेद व्यथित


लोक पाल के बनने से ऐसा हजूर डर क्या है
काले धन को खोने का ऐसा हजूर डर क्या हैं
जेल वेल की नौबत ही कब आ पायेगी इस से
बनने कब दोगे तुम इस को फिर हजूर डर क्या है ||

रिश्वत खोरी घोटालों से हडपी जो माया है
देने की बारी आएगी तुम ने जो पाया है
हाथी के आने पर कुत्ते शोर बहुत करते हैं
इसी तरह गद्दार देश के भी भौं २ करते हैं ||

कथनी करनी में अब कितना अंतर देख रहे हो
दिखने में ईमान दार हो सब कुछ देख रहे हो
इसी लिए क्या तुम चरणों के इतने दास बने हो
पकड़े रखो चरण इन्ही से ओहदे पर पंहुचे हो ||

जिस की थाली में खायाहै उस में छेद किया है
जिस का साथ दिया उस का ही बंटा ढार किया है
बिना बात के पांव फटे में देने में माहिर हो
षड्यंत्रों में फंसा किसी को भी बदनाम किया है ||

पहले तो नेता जी के ये आगे खोल खड़े थे
उस के बाद बड़े भईयाके पीछे खूब पड़े थे
दो भाइयों के बीच मुकदमे बाजी भी करवाई
अब न लोक पाल बन जाये यह सुपारी पाई ||

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