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रेगिस्तान [कविता] - दिवाकर ए. पी. पाल

राहगीरो के सुर्ख चेहरे
गीला बदन, सूखा गला.
आधी खाली मशक.
उँटों के काफ़िले:
उनकी घँटियों की
आँधी के साथ
जुगलबन्दी.

रेत के सूखे टिब्बे;
भूरा, रेत का गुबार.
पीली, चिलचिलाती धूप.
हरियाली के नाम पर
कैक्टस के छोटे-छोटे पौधे.

आज:
रेगिस्तान में ऊँट नहीं चलते;
चलती हैं एयर-कंडीशंड गाडियाँ.
मशक की जगह
ठंडी, मिनरल वाटर की बोतलें.
आई-पौड का संगीत तो है;
पर एकाकी कानों मे सीमित;
शांतिप्रद!

बहुत कुछ बदल गया!
नहीं बदला तो बस:
भूरा, रेत का गुबार
और
कैक्टस के छोटे-छोटे पौधे..
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कवि दिवाकर ए. पी. पाल ’वरदान’ ( ग्रामीण विकास को समर्पित एक स्वयंसेवी संस्था) के संस्थापक सदस्य.भी हैं। 

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