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य़ू ही गुज़ारा वक़्त याद आया [कविता] - दीप्ति सिन्हा

आप का आना भी इक
हवा का झोखा था
आप का जाना भी इक
हवा का झोखा था
मुझे महसूस यह होता है
आप को देखना भी इक धोखा था।

ज़िन्दगी कितनी छोटी होती है
यह आज जाकर जाना
कि बिछुड़ के मिलना और
मिलकर बिछुड़ना भी इक धोखा था।

क्या सुचमुच आप आये थे
या वह सूरत से यह सूरत मिलती थी?
आप खुद आकर कुछ कह भी गए
तो भी मै सुमझूंगी वो धोखा था।

वो मीठी मुस्कान वो प्यारी आवाज़
जो बचपन मे मैने सूनी थी
आज पतझड़ के इस मोड़ पर
समझती हूँ कि वह बचपन भी धोखा था।

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