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साब लोग [लघुकथा] - शशांक मिश्र ‘‘भारती’’


बड़े साब के घर रोज ही झक-झक होती, मेम साब बड़बड़ातीं और लड़तीं। पर साब बेचारे कुछ न बोलते। टालने की कोशिश करते या चुप रह जाते।हालांकि आफिस में उनका बड़ा रौब था।

एक दिन की बात है। कामवाली जब आई, उसके चेहरे पर निशान थे और हाथ में भी चोट थी।

मेम साब ने पूछा- तो रो पड़ी, यह सब उसके पति ने किया था।

मेम साब ने लम्बा-चौड़ा भाषण दिया। सुनते-सुनते वह तंग हो गई, उसके मुख से बस एक ही वाक्य निकला-आप साब लोग हैं। हम ठहरे गरीब, निपट गंवार आप जैसे कहां?

मेम साब चुप, कुछ बोलने को न रह गया था।

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