रमाकांत और बुद्धिनाथ दोनों जवानी से अधेड़ उम्र तक से अच्छे पडोसी थे. एक आंगन में पले बड़े, शादी की और अब अपने भरपूर परिवार के मुख्य सदस्य बने हैं. उस आंगन के बीच एक छोटी दीवार उनके मज़बूत रिश्ते के बीच थी, फिर भी वे सुबह-शाम, आते -जाते सब एक दूसरे को देख सकते थे, बातचीत कर सकते थे, और कभी कभार उनकी घरवालियाँ भाजी की अदला-बदली भी कर लेती थीं.

रमाकांत के पिता को गुज़रे १० साल हुए थे एक ही बेटा होने के नाते उसकी माँ पार्वती उसके साथ रहती थी. बद्रीनाथ उसे भाभी कह कर बुलाया करता था. कई महीनों से वह रमाकांत के बर्ताव में, उसकी बातों के लहजे में तब्दीली देख रहा था, पर बात उनके घर की है, यही सोचकर वह चुप रहा. कभी खड़े-खड़े-हाल चाल पूछ लेता. एक दिन ऊंची आवाजों ने उसके कान खड़े कर दिए. "जैसे बड़ी हो रही हो, लगार्ज़ होती जा रही हो. न अपने रहने का, न अपने कपड़ों का ख्याल है, न ठीक से उन्हें पहनती हो न साफ़ रखती हो.हमारी मर्यादा का भी कुछ ख़याल नहीं है!!!"

बद्रीनाथ को अपने घर से निकलते देखकर रमाकांत चुप हो गया, पर बात बात बद्रीनाथ के दिल छेद गयी. उससे रहा न रहा गया. वह बात का तेवर और उसकी दिशा पहचान रहा था. अपनी पत्नी की और देखकर, ऊंची और खीजती हुई आवाज़ में कहा-" भाग्यवान आज आंगन के उस पार से गन्दी बू आ रही है."

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