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उम्र के पड़ाव [कविता] - वन्दना गुप्त्ता


उम्र के इक पड़ाव पर
सब कुछ अच्छा लगता है
साथी का हर अंदाज़
निराला लगता है
हर खामी भी
इक अदा सी लगती है

उम्र के अगले पड़ाव पर
सब कुछ बदलने लगता है
साथी का सादा वक्तव्य भी
शूल सा चुभने लगता है
शब्दों के रस की जगह
अब ज़हर सा घुलने  लगता है

उम्र के आखिरी पड़ाव पर
कुछ भी न अच्छा लगता है
साथी की तो बात ही क्या
अपना साथ भी न अच्छा लगता है
कभी दिल बच्चा बनने लगता है
कभी उम्र का बोझ बढ़ने लगता है
उम्र के इस पड़ाव पर
कोई न चाहत होती है
सिर्फ़ खामोशी होती है
और इंतज़ार ..........................
एक खामोश पल का .........................

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5 टिप्पणियां

  1. उम्र के हर पड़ाव की अपनी ही कहानी है । बहुत सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  2. मेरी रचना को स्थान देने के लिये हार्दिक आभार्।

    जवाब देंहटाएं
  3. bahut sunder rachna hai badhai.
    saadar
    amita kaundal

    जवाब देंहटाएं
  4. जिंदगी वास्तव में कई पड़ावों से होकर गुजरती है, हरेक पड़ाव विशेष होता है,
    कोई थोडा ज्यादा ख़ुशी लिए तो कोई कुछ थोड़ा ज्यादा ही गम और एकाकीपन लिए ,
    बस हमें सबका आनंद लेना चाहिए.
    काफी अच्छी रचना, सादर बधाई....... !!

    जवाब देंहटाएं

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