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कही खो ना जाएँ...[कविता] - किरण सिन्धु

यंत्रों की भारी भीड़ में;
भाव सभी कहीं खो गए,
सम्बन्ध ह्रदय का नहीं रहा;
रिश्ते निःशब्द हो गए,
पैरों की गति तीव्र हुई;
कंठ और स्वर हुए मौन,
तन की थकान, मन की थकान;
आँखों की भाषा पढ़े कौन?
तू है पुरानी संगिनी;
मेरी कलम मुझे थाम ले,
घुटकर न रह जाए अनकही;
मेरे अपनों को पैगाम दे.

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5 टिप्पणियां

  1. बहुत ही सुन्दर है | लेकिन और आगे क्यों नहीं बढाया ?

    अवनीश तिवारी
    मुम्बई

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी रचना

    जवाब देंहटाएं
  3. तू है पुरानी संगिनी;
    मेरी कलम मुझे थाम ले,
    घुटकर न रह जाए अनकही;
    मेरे अपनों को पैगाम दे.
    बहुत खूब किरण जी। यूँ तो पूरी रचना भावपूर्ण है सुन्दर संदेश के साथ। वाह।
    सादर
    श्यामल सुमन
    +919955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं

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