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नारी [कविता] - श्यामल सुमन

रूप तेरे हजार, तू सृजन का आधार।
माँ की ममता है तुझमें, बहन का भी प्यार।।

बन के शक्ति - स्वरूपा, किया है जो काम।
फिर भी अबला जगत ने, दिया तुझको नाम।
तेरी करूणा अपार, तू है सबला साकार।
चेतना भी हृदय की, हो प्रियतम - श्रृंगार।।
रूप तेरे हजार, तू सृजन का आधार।
माँ की ममता है तुझमें, बहन का भी प्यार।।

कभी नाजों पली, बेवजह भी जली।
तू कदम से कदम तो, मिलाकर चली।
रूक कर तू विचार, न हो जीवन बाजार।
चंद सिक्कों की खातिर, न तन को उघार।।
रूप तेरे हजार, तू सृजन का आधार।
माँ की ममता है तुझमें, बहन का भी प्यार।।

त्याग-शांति की मूरत हो, धीरज की खान।
करे सम्मान नारी का, वो है महान।
नित कर तू सुधार, नहीं बनो लाचार।
बढे बगिया की खुशबू, सुमन का निखार।।
रूप तेरे हजार, तू सृजन का आधार।
माँ की ममता है तुझमें, बहन का भी प्यार।।

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