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हम पलकोँ से बोझ उठाना भूल गए [ग़ज़ल] - सिराज फ़ैसल ख़ान


रोज़ नया एक ख़्वाब सजाना भूल गए
हम पलकोँ से बोझ उठाना भूल गए

साथ निभाने की कसमेँ खाने वाले
भूले तो सपनोँ मेँ आना भूल गए

जब से तुमने नज़र मिलाना छोड़ दिया
हम लोगोँ से हाथ मिलाना भूल गए

उनसे मिलने उनके घर तक जा पहुँचे
क्योँ आये हैँ यार बहाना भूल गए

झूठोँ ने सारी सच्ची बातेँ सुन लीँ
सूली पर मुझको लटकाना भूल गए

पीने वाले मस्जिद तक कैसे पहुँचे
हैरत है ग़ालिब मैख़ाना भूल गए

तुमने जब से छत पर आना शुरु किया
लोग उतरकर नीचे जाना भूल गए

चकाचौँध मेँ बिजली की ऐसे खोये
कब्रोँ पर हम दीये जलाना भूल गए

दर्द पे कुछ लिखने की मैँने क्या सोची
मीर भी अपना दर्द सुनाना भूल गए

अंग्रेजी का भूत चढ़ा ऐसा सिर पर
बच्चे हिन्दी मेँ तुतलाना भूल गए

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7 टिप्पणियाँ

  1. wah ! bahut achche !

    Avaneesh

    जवाब देंहटाएं
  2. उनसे मिलने उनके घर तक जा पहुँचे
    क्योँ आये हैँ यार बहाना भूल गए


    बहुत खुब।

    जवाब देंहटाएं
  3. अंग्रेजी का भूत चढ़ा ऐसा सिर पर
    बच्चे हिन्दी मेँ तुतलाना भूल गए
    Raashtra bhaashaa par angrezi ke haawii hote jaane par vyakt chintaa! aabhaar aur swaagatey.

    जवाब देंहटाएं
  4. एक शानदार गजल...बधाई.......

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह बहुत खूब क्या कहने लाजवाब ग़ज़ल

    जवाब देंहटाएं

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