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पदपूजा का आभामंडल [व्यंग्य] - राजकुमार साहू

पदपूजा का आभामंडल हर किसी को भाता है। जिसे देखो, वह पद के पीछे, अपना पग हमेशा आगे रखना चाहता है। मैं तो यह मानता हूं कि जिनके पास कोर्इ बड़ा पद नहीं है, समझो वह कुछ भी नहीं है। उसकी औकात उतनी है, जितनी सरकार की उंची कुर्सी में बैठे सत्तामद के मन में, जनता की है। पदपूजा की कहानी देखा जाए तो काफी पुरानी है। ऐसा लगता है, जैसे पद पूजा की परिपाटी कभी खत्म नहीं होने वाली है। पद का गुरूर भी बड़ा अजीब है, किसी को कोर्इ बड़ा पद मिला नहीं कि वह सातवें आसमान में हवार्इयां भरने लगता है। वह सोचता है, जैसे दुनिया उसके आगे ठहर गर्इ है। वह जो चाहेगा, कर सकता है। पदपूजा की महिमा का परिणाम होता है कि कल तक लोगों के आगे, जो घिसट-घिसटकर चलता था, वही आज कर्इयों का मार्इ-बाप बना नजर आता है।
पदपूजा का आभा मंडल मुझे भी भाता है। मैं भी चाहता हूं कि मुझे कोर्इ बड़ा पद मिले तो अपनी धौंस जमाउं। मैं अक्सर देखता हूं कि पद, कैसे रेवडि़यां की तरह बंटता है, कैसे कामचोर उंची कुर्सी में बैठकर जनता की गाढ़ी कमार्इ को चट करता है। उन जैसों को पद के मद में पैसा हजम करने का शुरूर, हर पल सवार रहता है। उन्हें बदहजमी का भी डर नहीं होता, जब कभी ऐसा लगता है तो सफेदपोश बनकर कमाए गए पैसे को काला चादर ओढ़कर लाकरों में सुरक्षित रख दिया जाता है।
मैं इतना जरूर जानता हूं कि पद मिलेगा तो ही, खुद की पूजा हो सकती है और पद से ही धन की बरसा होती है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बिना पद के किसी को एक झोपड़ी बनाने, पूरी जिंदगी इंतजार करनी पड़ती है और एक वो होता है, जिसे पद मिलते ही एशो-आराम का मकान बैठे-ठाले नसीब हो जाता है। उन्हें देने वालों की कमी नहीं होती। पद नहीं होने के पहले भाग्य भी रूठा रहता है, मगर जैसे ही कोर्इ पद मिलता है, उसके बाद तो विपन्नता की लहरें जिंदगी से खत्म हो जाती हैं।
किसी को पद मिलने के बाद जिस तरह पूजा होते देखता हूं तो, मुझे लगता है कि व्यकित कुछ नहीं होता, केवल पद होता है। पद मिलते ही साथ में चलने वाले सैकड़ों बिना बुलाए मिल जाते हैं। एक बात है, जब तक पद होता है, तब तक व्यकित की पूजा होती है। उसे कोर्इ भी चीज की कमी नहीं होती, सभी चीजें बिना मांगे मिल जाती हैं। पदपूजा में लीन व्यकित, पदासीन व्यकित के मन को भांपने में ऐड़ी-चोटी, एक करता है। जिन चीजों की पदवी से लदा व्यकित लालसा नहीं रखता, वह भी घर पहुंच जाता है, उसे खुद पता नहीं रहता। यही कारण है कि आज-कल मैं हर पल सोचते रहता हूं कि दिन भर कलम खिसार्इ के बाद कुछ नहीं मिलता, उल्टा दिन भर सिर खपाना पड़ता है। ऐसी सिथति में पद पूजा का आभा मंडल मुझे खींच रहा है और मैं ओहदेदार पद पाने बेताब हूं, जिसे धन की बरसा भी हो और पूजा भी हो। कर्इ बरसों से मन में केवल एक ही चाहत थी कि एक छोटा सा कलमकार बन जाउं और रोजी-रोटी भी चलती रहे, लेकिन जिस तरह पदपूजा होते देखता हूं, उसके बाद से मन, केवल पद के पीछे भाग रहा है। पद पूजा की किस्में भी आभामंडल के साथ बदल जाती हैं। सोच रहा हूं, मैं कौन सी पद पूजा का चोला ओढ़ूं, जिससे दाम भी मिल जाए और दमड़ी भी न जाए?

राजकुमार साहू
जांजगीर, छत्तीसगढ़

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