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काबू रखिये [ग़ज़ल] - वैशाली भारद्वाज


अपने आगाज़ पे काबू रखिये
अपने अंदाज़ पे काबू रखिये

लोग बनते हैं बिगड़ते हैं सिर्फ बातो से
अपने अल्फाज़ पे काबू रखिये

कल पे होगी जिसकी परछाई जरूर
अपने उस आज पे काबू रखिये

खुद फरोशी के इस ज़माने में साहिब
वफ़ा के अपने मिजाज़ पे काबू रखिये

छूट जाता है बहुत कुछ अक्सर मुकाम से पहले
जिन्दगी में अपने आमाज़ पे काबू रखिये

तेरी ख़ुशी के इत्माम का यही सबब होगा
हो सके तो दिल के आज़ पे काबू रखिये

तू फंसा है हाथ और हालात के दरमियाँ
यक़ीनन इनके ऐराज़ पे काबू रखिये
****************

शब्दार्थ -आमाज़ -लक्ष्य ,इत्माम -सार ,आज़-घमंड ,ऐराज़ -वृद्धि

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6 टिप्पणियां

  1. लोग बनते हैं बिगड़ते हैं सिर्फ बातो से
    अपने अल्फाज़ पे काबू रखिये

    वाह सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह क्या खूब कही

    तू फंसा है हाथ और हालात के दरमियाँ
    अपने अल्फाज़ पे काबू रखिये

    आज की हालात का सही निरूपण

    जवाब देंहटाएं
  3. Ghazal ke kai sher kaafi jaandar ban pade hain.
    Ek vicharottejak Evam sunder ghazal!!

    जवाब देंहटाएं
  4. छूट जाता है बहुत कुछ अक्सर मुकाम से पहले
    जिन्दगी में अपने आमाज़ पे काबू रखिये.

    बहुत ही सुन्दर गजल लिखी है. लेखिका को बहुत बहुत बधाई.

    जवाब देंहटाएं

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