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खग्रास [कविता] - मोहन राणा


हमने अँधेरे को मिटाने की कोशिश
पर गुलाम हो गए चमकते बल्बों की चौंधियाहट से
कि नहीं दिखता कुछ भी उस चमकते अँधेरे में,
गढ़ा एक नया अँधेरा जिसकी रोशनी में मिटा दिया दिन को
खिड़की पे खींच कर पर्दा

तुम्हारी निराशा को अपनी कोशिश में
ठीक करते करते मैं भूल भी गया अपनी गलतियों को
अगर तुम्हें मिले वह आशा का चकमक पत्थर इस घुप्प में टटोलते,
बंद कर देना बत्ती कमरे से बाहर जाते हुए
देखना चाहता हूँ अँधेरे को तारों की रोशनी में
बंद आँखों के भीतर.

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3 टिप्पणियां

  1. तुम्हारी निराशा को अपनी कोशिश में
    ठीक करते करते मैं भूल भी गया अपनी गलतियों को
    अगर तुम्हें मिले वह आशा का चकमक पत्थर इस घुप्प में टटोलते,
    बंद कर देना बत्ती कमरे से बाहर जाते हुए
    देखना चाहता हूँ अँधेरे को तारों की रोशनी में
    बंद आँखों के भीतर.

    अद्धभुत रचना।

    जवाब देंहटाएं
  2. गढ़ा एक नया अँधेरा जिसकी रोशनी में मिटा दिया दिन को
    खिड़की पे खींच कर पर्दा
    अँधेरो को हम खुद ही बनाते है, और उस्मै खुद ही गुम् हो जाते है... अच्छी कविता.

    जवाब देंहटाएं

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