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रिश्ता तथा समय [दो कवितायें] - संजय जनागल

रिश्ता

शिक्षक और विद्यार्थी
पूरी दुनिया पूजती थी
कल जो
यह रिश्ता।
आज अख़बारों में
बदनाम हुआ
यह रिश्ता।
उठ रही है उंगलियां
विद्यालय की तरफ
क्या अब ख़त्म
हो जायेगा
यह रिश्ता।
कौन है ज़िम्मेदार
इसके लिए
शिक्षक, विद्यार्थी
या उनका
यह रिश्ता।
पढ़कर और देखकर
अन्जाम इस रिश्ते का
आज हर इन्सान
है परेशान !

समय

कल
जो मेरे पास था
आज वह
दूर है
खुशियाँ को ढूंढा
चारों ओर
पर आज ग़मों की
बौछार है
समझा था जिसको
मुट्ठी में
आज वह मुझपे
सवार है
बीत गया
वो समय कब
मुझे तो आज भी
उसका
इन्तज़ार है
समझा ना क़ीमत जिसकी
आज वो मुझे रूलाने को
तैयार है।
---------------------
- संजय जनागल
मुख्यमंत्री कार्यालय,
सचिवालय, जयपुर

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8 टिप्पणियाँ

  1. दोनों अच्छी कवितायें हैं।

    जवाब देंहटाएं
  2. शिक्षक, विद्यार्थी
    या उनका
    यह रिश्ता।
    पढ़कर और देखकर
    अन्जाम इस रिश्ते का
    आज हर इन्सान
    है परेशान !

    सच कहा जनांगल जी

    जवाब देंहटाएं
  3. शिक्षक एवम विद्यार्थी के बीच के रिस्ते इतने कम्जोर नही होते की ...किसी एक की गलती से बदनाम हो जाय...धेर्य की जरूर है..अच्छी कविता..बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. स्वार्थपरता और भागदौड़ के इस दौर में सभी रिश्ते अपना महत्व खोते जा रहे हैं. शिक्षक और शिक्षार्थियों का रिश्ता भी इसका अपवाद नहीं है. वैसे भी इसके लिये कोई एक पक्ष ही पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं है. शिक्षक और विद्यार्थियों के साथ-साथ उनका परिवार और समाज भी इसके लिये उतने ही दोषी हैं.
    दूसरी कविता भी प्रकारान्तर से व्यक्ति और उससे सम्बद्ध संसार के बदलते रिश्तों की ही कथा है.
    भाव अच्छे हैं पर शिल्प और काव्यात्मकता की दृष्टि से दोनों कवितायें कमज़ोर ही लगीं.

    जवाब देंहटाएं
  5. samajha na kimat jiski aaj vo rulane ko tyar he
    LINE pasand aayi

    जवाब देंहटाएं

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