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उपरी हवा तथा बुरी नज़र [दो लघुकथायें] - शोभा रस्तोगी शोभा


ऊपरी हवा [लघुकथा-१]

'सुना है ,तेरा बेटा बीमार है !'

'हाँ , बहन ! महीना हो गया | बेहोशी में भी कुछ-कुछ बोलता रहता है |'

'किसी सयाने को दिखा | ऊपर की हवा तो नहीं ..?'

'मरघट वाले बाबा का इलाज चल रहा है |झाड़-फूंक हो रही है | कहते है - पड़ोसन ने कुछ करा दिया है '|

'नास हो उस कमबख्त का | बाबा क्या कहते है ?'

'कह रहे थे महीने भर में ठीक हो जायेगा |'

अगला महीना बीतने से पहले जवान लड़का बीत गया |

=====

बुरी नज़र [ लघुकथा-२]

'बधाई हो ठकुराइन ,पोता हुआ है |'

'हाँ, हाँ, आओ चौधराईन ! अरे ! ये क्या ? दरवाजे पे भिखारी खड़ा है ? हटा इसे | छोरे को बुरी नज़र लग जाएगी |'

चौधराईन छोरे को लेकर चौक में जाने लगी | एकाएक उनका पैर फिसला |पोता हाथ से छूटा | अचानक दरवाजे पर खड़े भिखारी ने दौड़कर अपने गंदे हाथों में सम्भाल लिया | पर इस उठा-पटक में वह अपने दायें पैर की हड्डी तुड़ा बैठा|

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लेखिका परिचय


नाम-शोभा रस्तोगी शोभा
शिक्षा - एम. ए. [अंग्रेजी-हिंदी ], बी. एड. , शिक्षा विशारद, संगीत प्रभाकर [ तबला ]
जन्म - 26- अक्तूबर 1968 , अलीगढ [ उ. प्र. ]
सम्प्रति - सरकारी विद्यालय दिल्ली में अध्यापिका
पता - RZ-D.-- 208, B, डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर - || पालम कालोनी, नई दिल्ली - 77.

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5 टिप्पणियां

  1. अंधविश्वास और घिसी पिटी मान्यताओं को अब समाप्त हो जाना चाहिये।

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  2. बहुत अच्छी लघुकथायें---बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  3. व्यवहारिक है और साफ संदेश देने वाली लघुकथायें हैं।

    जवाब देंहटाएं
  4. aap sabhi ko meri laghukathayen pasand aaee, shukriya . -- shobha rastogi shobha

    जवाब देंहटाएं

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