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छुटटी नहीं मनाते[फुलवारी] - कृष्ण शलभ {बाल शिल्पी अंक 20} प्रस्तुति - डॉ. मो. अरशद खान

प्यारे बच्चों,
"बाल-शिल्पी" पर आज आपके डॉ. मो. अरशद खान अंकल आपको "फुलवारी" के अंतर्गत कृष्ण शलभ अंकल की कविता "छुटटी नहीं मनाते" पढवा रहे हैं। तो आनंद उठाईये इस अंक का और अपनी टिप्पणी से हमें बतायें कि यह अंक आपको कैसा लगा।

- साहित्य शिल्पी
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सूरज जी, तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो


लगता तुमको नींद न आती
और न कोइ काम तुम्हें,
जरा नहीं भाता क्या मेरा
बिस्तर पर आराम तुम्हें।
खुद तो जल्दी उठते ही हो, मुझे उठाते हो। 


कब सोते, कब उठते हो
कहां नहाते-धोते हो,
तुम तैयार बताओ हमको
कैसे झटपट होते हो।
लाते नहीं टिफिन क्या खाना खाकर आते हो ?


रविवार आफिस बंद रहता
मंगल को बाजार भी,
कभी-कभी छुटटी कर लेता
पापा का अखबार भी।
यह क्या बात , तुम्हीं बस छुटटी नहीं मनाते हो।
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कृष्ण शलभ, सहारनपुर (उ0 प्र0)

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4 टिप्पणियां

  1. रविवार आफिस बंद रहता
    मंगल को बाजार भी,
    कभी-कभी छुटटी कर लेता
    पापा का अखबार भी।
    यह क्या बात, तुम्हीं बस छुटटी नहीं मनाते हो।

    बहुत सुन्दर

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