आज इस माह का अंतिम दिन है और साथ ही यह अमृता प्रीतम जी का जन्म दिवस भी है तो उन्हे याद करने के अवसर को चूकना नहीं चाहता सो अधूरे प्रेम की अधूरी प्यास के दस्तावेजों की इस सर्जक को श्रंद्धांजलि स्वरूप यह पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ जो अपने प्रशंसकों के बीच अपनी रचनाओ के माध्यम से और जीवन के निशाकाल में उनके सहयात्री रहे इमरोज की नजरों में आज भी बीता हुआ कल नहीं हैं। अमृता प्रीतम जी की कलम उन विषयों पर चली जो सामान्यतः भारतीय नारी के सामाजिक सरोकारों से इतर थे। जहाँ अमृता जी के अन्य समकालीन लेखकों द्वारा भारतीय नारी की तत्कालीन सामाजिक परिवेश में उनकी व्यथा और मनोदशा का चित्रण किया है वहीं अमृता जी ने अपनी रचनाओं में इस दायरे से बाहर निकल कर उसके अंदर विद्यमान ‘स्त्री’ को मुखरित किया है। ऐसा करते हुये अनेक अवसरों पर वे वर्जनाओं को इस सीमा तक तोडती हुयी नजर आती हैं कि तत्कालीन आलोचकों की नजर में अश्लील कही जाती थीं।
चित्र 1 पत्रकार मनविन्दर कौर द्वारा जागरण ग्रुप की पत्रिका सखी के अप्रैल 2003 में लिखा गया लेख

अमृता जी ने अपना जीवन वर्जनाओं का न मानते हुये वेलौस जिया, और जो कुछ किया उस पर पक्के रसीदी टिकट की मुहर लगाकर सार्वजनिक रूप से स्वीकार भी कर लिया। वह भले ही सामाजिक परिवेश में ग्राह्य रहा हो या न रहा हो। उन्होंने अपने जीवन के चालीस वर्ष साहिर लुधियानवी की किताबों के कवर डिजायन करने वाले चित्रकार इमरोज के साथ बिताये। नई दिल्ली के हौजखास इलाके का मकान के-25 इन दोनो के सहजीवन के 40 वर्षो का मौन साक्षी रहा है। अपने जीवन के अंतिम पडाव में भी अमृताजी इमरोज के साथ ही थीं। इमरोज के अमृता से लगाव की कल्पना आप इस छोटे से तथ्य से लगा सकते हैं कि इमरोज की नजरों में वे आज भी गुजरे कल की बात (पास्ट) नहीं हैं। वर्ष 2003 में जब अमृता जी जीवित थीं तो जागरण ग्रुप की पत्रिका सखी के लिये पत्रकार मनविन्दर कौर द्वारा उनके घर नई दिल्ली के हौज खास जाकर उनसे और इमरोज से बातचीत की गयी थी जो सखी के अप्रैल 2003 में प्रकाशित हुई थी। कालान्तर में जब अमृता जी नहीं रहीं तो 2008 में लेखिका मनविन्दर कौर ने पुनः हौज खास जाकर यह टोह लेने का प्रयास किया कि अमृता के न रहने के बाद उनके बगैर इमरोज कैसा अनुभव कर रहे है तो इमरोज का उत्तर उनके लिये हैरत में डालने वाला था। इमरोज ने कहा था कि, ‘अमृता को पास्ट टेन्स मत कहो, वह मेरे साथ ही है, उसने जिस्म छोडा है साथ नहीं।’
अमृता जी नई दिल्ली के हौज खास इलाके में रहती थी। इस घर के प्रवेश द्वार पर आज भी इमरोज द्वारा डिजायन की गयी अमृता प्रीतमजी के नाम की ही पट्टिका लगी है। इमरोज यह बखूबी जानते थे कि अमृता का प्यार साहिर लुधियानवी थे लेकिन उन्होंने अपनी और अमृता की दोस्ती में इस बात को कभी भी किसी अडचन या अधूरेपन के रूप में नहीं देखा। साहिर लुधियानी के बारे में उनका कहना है, ‘साहिर के साथ अमृता का रिश्ता मिथ्या और मायावी था जबकि मेरे साथ उसका रिश्ता सच्चा और हकीकी, वह अमृता को बेचैन छोड गया और मेरे साथ संतुष्ट रही।’ पिछले वर्ष रंजना भाटिया जी ने अपने ब्लाग पर बरसों पहले इमरोज से हुयी बातचीत का एक हिस्सा प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने यह सवाल किया था इस घर में अमृता का कमरा बाहर तथा इमरोज का कमरा अंदर क्यों है? इस पर इमरोज के द्वारा दिया गया उत्तर अमृता के प्रति इमरोज के लगाव का जो चित्र खींचता है वह अद्वितीय है, ‘मैं एक आर्टिस्ट हँू और वह एक लेखिका। पता नहीं कब वो लिखना शुरू कर दे और मैं पेंटिंग बनाना। इतना बडा घर होता है फिर भी पति पत्नी ऐक ही बिस्तर पर क्यों सोते हैं? क्योंकि उनका मकसद कुछ और होता है। हमारा ऐसा कुछ मकसद नहीं था इसलिये हम अलग सोते थे। सोते वक्त अगर मैं हिलता तो उसे परेशान होती और अगर वह हिलती तो मुझे। हम एक दूसरे को कोई परेशानी नहीं देना चाहते थे। आज शादियां सिर्फ औरत का जिस्म पाने के लिये होती हैं। मर्द के लिये औरत सिर्फ सर्विग वोमेन है कयांेकि वह नौकर से सस्ती होती है। एसे लोगों को औरत का प्यार कभी नहीं मिलता। आम आदमी को औरत सिर्फ जिस्म तक ही मिलती है प्यार तो किसी किसी को ही मिलता है। औरत जिस्म से बहुत आगे है, पूरी औरत उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।’
चित्र 2 इमरोज जिन्होने 40 वर्षो तक उनके साथ जीवन बिताया और आज भी उनके ही साथ रहते हैं।

अमृता के प्रति इमरोज के इस गहरे भावनात्मक लगाव की तह में जाकर उस दिन की पडताल करने पर रंजना जी को वह दिन भी दिखलाई पडा जब इमरोज ने अपना जन्मदिवस अमृता जी के साथ मनाया था। इस दिन को याद करते हुये इमरोज ने कहा, ‘वो तो बाइ चांस ही मना लिया। उसके और मेरे घर में सिर्फ एक सड़क का फासला था। मै उससे मिलने जाता रहता था। उस दिन हम बैठे बातें कर रहे थे तो मैने उसे उसे बताया कि आज के दिन मैं पैदा भी हुआ था। वो उठकर बाहर गयी और फिर आकर बैठ गई। हमारे गांव में जन्मदिन मनाने का रिवाज नहीं, अरे पैदा हो गये तो हो गए, ये रिवाज तो अंग्रेजो से आया है। थोडी देर के बाद उसका नौकर केक लेकर आया। उसने केक काटा थोडा मुझे दिया और थोडा ख्ुद खाया। ना उसने मुझे हैप्पी बर्थडे कहा और ना ही मैने उसे थैक्यू। बस दोनो एक दूसरे को देखते और मुस्कुराते रहे।’ बस इसी तरह एक दूसरे को देखकर मुस्कुराना और बिना कुछ भी कहे सब कुछ कह जाने वाली भाषा के साथ जीने वाली अमृताजी आज हमारे बीच न हों लेकिन इस बात से इमरोज को कोई फर्क नहीं पडता क्योकि उनका मानना है कि वे उनके साथ तो आज भी हैं ना।

2 comments:

  1. अमृता जी को याद रखने के लिये साहित्य शिल्पी का धन्यवाद। आलेख जानकारी से भरा है।

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  2. औरत जिस्म से बहुत आगे है, पूरी औरत उसी को मिलती है जिसे वो चाहती है।

    सुंदर और सार्थक आलेख...

    सुषमा गर्ग जी बधाई...

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