कण-कण विलख रहा धरती का
गिरि, सागर, नदियाँ विषमय हैं
चारों ओर धरा बारूदी
गोलों की होती जय-जय है
किसकी कौन सुने, जब -
सबमें मद ने वास किया है
धरतीपुत्रों ने ही सारा
सत्यानाश किया है!

घर-घर भरी विषैली गैसें
धुआँ भरा हर वातायन है
उजड़े वन, बंजर है धरती
सूखी फ़सलें प्यासी मरती
कौन कहे क्या कहे किसी से
खुद ने खुद का नाश किया है
धरतीपुत्रों ने ही सारा
सत्यानाश किया है!

डरे-डरे वन-उपवन सारे
सहमा-सा ठहरा हिमगिरि है
हे प्रगतिशील! हे उन्नत मानव !
'जियो और जीने दो सबको'
ईश्वर ने दी धरती सारी
इतना-सा आकाश दिया है
फिर क्यों इतनी मारा-मारी
इतना बड़ा विनाश किया है.
धरतीपुत्रों ने ही सारा
सत्यानाश किया है!

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