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मन का चीवर [गीत] - प्रभुदयाल श्रीवास्तव


मन का चीवर उड़ उड़ जाता
लहरों जैसी लगे छलांग
क्रम यह न रुकता थमता है
चले निरंतर और अविराम|

यह तन तो वीणा जैसा है
ज्यादा तार कसे तो टूटा
किंतु वहीं ढीले रहने पर
थोड़ा सा स्वर भी न फूटा
रस्सा कसी भाग्य कर्मों की
यूं नट नागर नाग नाथते
कर्मों का फल देने वाले
दिखे सुदर्शन चक्र साधते
असुरों और सुरों में अविरल
चलता रहा घोर संग्राम|

मन बुद्धि में बसी आत्मा
तन तो मात्र बिजूका जैसा
बिना प्राण के सब कुछ मिट्टी
बिना प्राण के जीवन कैसा
समावेश सम द्दर्ष्टि समन्व‌य
समता की सुंदर परिपाटी
चिड़ियों तक ने पूर्ण जिंदगी
कैसे मगन मुदित मन काटी
पुलक परिंदे चहक चहक कर
देते रोज यहि पैगाम

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5 टिप्पणियां

  1. kavitaa loklubhavan vaali aur man ko bhaane wali hai. lekhak ko badhai----goverdhan yadav,chhindwara{mP} 480001 phone 09424356400

    जवाब देंहटाएं
  2. मन बुद्धि में बसी आत्मा
    तन तो मात्र बिजूका जैसा
    बिना प्राण के सब कुछ मिट्टी
    बिना प्राण के जीवन कैसा
    समावेश सम द्दर्ष्टि समन्व‌य
    sunder geet aapsada hi bahut pyare geet likhte hain badhai
    saader
    rachana

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बहुत ही प्यारा गीत‌
    जैसे राज दुलारा गीत‌
    पी एन श्रीवास्तव‌
    सिविल लाइंस सागर‌

    जवाब देंहटाएं
  4. सभी प्रतिक्रिया देने वालों को धन्यवाद‌

    जवाब देंहटाएं

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