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तुम्हारे नाम [ग़ज़ल] - खुर्शीद हयात


वह तेरी हंसी थी, वह कैसा समां था
मुअत्तर तेरी ज़ुल्फ़ से गुलसितां था,

हिनाई सफ़र था, चमन नग़मा ज़न था
मेरी जिंदगी में तू रूह ऐ रवां था;

ना जाने है क्यों, मुझ से तू बदगुमाँ अब
ये कैसा समां है वो कैसा समां था;

न था दरम्यान फासला कोई अपने
नहीं कुछ निहां जो भी था वह अयाँ था

सताती है अब मुझ को वह याद ए माजी
हसीन तू भी था और मैं भी जवान था

अब आया है करने को अहवाल पुरसी
अब इतने दिनों यह बता तू कहाँ था .

हयात आज है जिंदगी तल्ख़ अपनी
वह दिन याद हैं जब मेरी जान ए जान था

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3 टिप्पणियाँ

  1. चेतन रामकिशन ‎2 अक्तूबर 2011 को 1:14 pm

    वाह !हयात जी, एहसासों से सजी रचना!
    हयात आज है जिंदगी तल्ख़ अपनी
    वह दिन याद हैं जब मेरी जान ए जान था..आपकी एक और बेहतरीन रचना! "स्मृति कब मृत होती हैं रहे भले न देह!आपके अनमोल लेखन को नमन!चेतन रामकिशन. ‎

    जवाब देंहटाएं
  2. ‎.. आज इस ग़ज़ल को पढ़ने का मज़ा कुछ और ही है Sir...हरबार.. बहुत प्यार से सवारां है आपने इसे.. और आपकी इस खूबसूरत पेशकश के साथ जो ''राही मासूम रज़ा'' साहब के भी अशहार आपने जोड़े है.. उसका अलग से शुक्रिया!!

    जवाब देंहटाएं

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