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मैथिली शरण गुप्त [बाल शिल्पी अंक-23] - डॉ. मोहम्मद अरशद खान


प्यारे बच्चों,
"बाल-शिल्पी" पर आज आपके डॉ. मो. अरशद खान अंकल आपको "विरासत" के अंतर्गत राष्ट्र कवि मैथिली शरन गुप्त से परिचित करा रहे हैं। तो आनंद उठाईये इस अंक का और अपनी टिप्पणी से हमें बतायें कि यह अंक आपको कैसा लगा।

- साहित्य शिल्पी
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मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म झाँसी के चिरगाँव में 3 अगस्त 1886 को हुआ था। हिंदी कविता में जब ब्रज भाषा का बोलबाला था, तो उन्होंने खड़ी बोली में काव्य-रचना के द्वारा उसकी स्थापना और स्वीकार्यता के लिए ठोस ज़मीन तैयार की। उन्होंने एक दर्जन से अधिक रचनाएँ रचीं; जिनमें ‘भारत भारती को विशेष लोकप्रियता हासिल हुई। परतंत्र भारतीयों के मन में जोश और राष्ट्र-स्वाधीनता का बिगुल फूँकने के कारण उसे देशभक्तों की गीता कहा गया। उनकी मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को हुई।

सरकस

होकर कौतूहल के बस में,
गया एक दिन मैं सरकस में।
भय विस्मय के खेल अनोखे,
देखे बहु व्यायाम अनोखे।

एक बड़ा-सा बंदर आया
उसने झटपट लैंप जलाया।
डट कुर्सी पर पुस्तक खोली,
आ तब तक मैंना यूं बोली-

‘‘हज़िर है हुजऱू का घोड़ा’’
चौंक उठाया उसने कोड़ा।
आया तब तक एक बछेरा,
चढ़ बंदर ने उसको फेरा।

टट्टू ने भी किया सपाटा,
टट्टी फांदी चक्कर काटा।
फिर बंदर कुर्सी पर बैठा,
मुँह में चुरुट दबाकर ऐंठा।

माचिस लेकर उसे जलाया,
और धुँआं भी ख़ूब उड़ाया।
ले उसकी अधजली सलाई,
तोते ने आ तोप चलाई।

एक मनुष्य अंत में आया,
पकड़े हुए सिंह को लाया।
मनुज सिंह की देख लड़ाई,
की मैंने इस भांति बड़ाई।

‘‘किसे साहसी जन डरता है,
नर नाहर को वश करता है।’’
मेरा एक मित्र तब बोला--
‘‘भाई तू भी है बम भोला।

यह सिंही का जना हुआ है
किंतु सियार यह बना हुआ है
यह पिंजड़े में बंद रहा है
नहीं कभी स्वच्छंद रहा है

छोटे से यह पकड़ा आया
मार मार कर गया सिखाया
अपने को भी भूल गया है
आती इस पर मुझे दया है ।

ओला

एक सफेद बड़ा-सा ओला,
था मानो हीरे का गोला।
हरी घास पर पड़ा हुआ था,
वहीं पास मैं खड़ा हुआ था।

मैंने पूछा--‘‘क्या है भाई ?
तब उसने यों कथा सुनाई।
‘‘जो मैं अपना हाल बताऊँ,
कहने में भी लज्जा पाऊँ।

पर मैं तुझे सुनाऊँगा सब
कुछ भी नहीं छिपाऊँगा अब।
जो मेरा इतिहास सुनेंगे,
वे उससे कुछ सार चुनेंगे।

यद्यपि मैं न रहा कहीं का,
वासी हूँ मैं किंतु यहीं का।
सूरत मेरी बदल गई है
दीख रही वह तुम्हें नई है।

मुझमें आर्द्र भाव था इतना,
जल में हो सकता है जितना।
मैं मोती-सा निर्मल था,
तरल किंतु अत्यंत सरल था।

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