नज़र आ रहा है धुआँ ही धुआँ
कोई नज़्रे-आतिश है बस्ती वहाँ

सरासर हैं झूठे वो सारे बयाँ
लगे दोष तो क्या कहे बेज़ुबाँ

वहाँ कैसे महफूज़ कोई रहे
दरिंदे खुले आम घूमें जहाँ

फिरा ढूँढता सहरा-सहरा मगर
न मिल पाया प्यासे को कोई कुआँ

जो ज़ुल्मों के साए ज़मीं पर पड़े
नज़र उठ गई जानिबे-आसमाँ

ख़ुशामद करें जो मिलेंगे हज़ार
कहाँ मिलते ‘देवी’ मगर कद्रदाँ

ठिकाने बदलती है ‘देवी’ अगर
नज़र बिजलियों की गई है वहाँ.
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3 comments:

  1. अमिता कौंडल9 नवंबर 2011 को 8:48 pm

    जो ज़ुल्मों के साए ज़मीं पर पड़े
    नज़र उठ गई जानिबे-आसमाँ
    ख़ुशामद करें जो मिलेंगे हज़ार
    कहाँ मिलते ‘देवी’ मगर कद्रदाँ

    बहुत सुंदर ग़ज़ल है बधाई,

    सादर,

    अमिता कौंडल

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