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जो आज तक रहा था जाने-जहाँ हमारा [ग़ज़ल] - देवी नागरानी


वो ही चला मिटाने नामो-निशाँ हमारा
जो आज तक रहा था जाने-जहाँ हमारा

दुशमन से जा मिला है अब बागबाँ हमारा
सैयाद बन गया है लो राज़दाँ हमारा

ज़ालिम के ज़ुल्म का भी किससे गिला करें हम
कोई तो एक आकर सुनता बयाँ हमारा

हर बार क्यों नज़र है बर्क़े-तपाँ की उसपर
हर बार है निशाना क्यों आशियाँ हमारा

दुश्मन का भी भरोसा जिसने कभी न तोड़ा
बस उस यकीं पे चलता है कारवाँ हमारा

बहरों की महफ़िलों में हम चीख़ कर करें क्या
चिल्लाना-चीख़ना सब है रायगाँ हमारा

परकैंच वो परिंदे हसरत से कह रहे हैं
‘देवी’ नहीं रहा अब ये आसमां हमारा

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7 टिप्पणियाँ

  1. सब माया है ...सब कुछ माया है....

    वैसे अच्छी रचना है....दिळ के भाव झलकते है...

    जवाब देंहटाएं
  2. दुश्मन का भी भरोसा जिसने कभी न तोड़ा
    बस उस यकीं पे चलता है कारवाँ हमारा
    अच्छी ग़ज़ल

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना |

    अवनीश तिवारी

    मुम्बई

    जवाब देंहटाएं
  4. रमेश कुमार1 अप्रैल 2016 को 10:06 am

    ज़ालिम के ज़ुल्म का भी किससे गिला करें हम
    कोई तो एक आकर सुनता बयाँ हमारा..

    वाह वाह

    जवाब देंहटाएं

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