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गज़ल [ग़ज़ल] - शक्ति प्रकाश


रंगो खुश्बू फालतू, आबो हवा बेकार है
चाराग़र हो बेइमां तो हर दवा बेकार है

मोमिनों में आजकल ये बहस भी चलने लगी
ये खुदा बेकार है या वो खुदा बेकार है

लट्ठ के आगे लॅंगोटी खुल गई तो क्या कहें
मुद्दई बेकार है या मुद्दआ बेकार है

हम अज़़ल से जी रहे हैं तीरग़ी के खौफ में
बोलिये मत हाल ये इस मर्तबा बेकार है

आप हों बेध्यान ग़र और जल गई हों रोटियॉं
तो कहो आराम से बस, ये तवा बेकार है

जिन उसूलों की किताबों ने पलट दीं सल्तनत
आजकल हैं फ़ालतू, ग़ो हर सफ़ा बेकार है

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