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अगर हृदय पत्थर का होता [कविता] - आचार्य संजीव वर्मा "सलिल"


अगर हृदय पत्थर का होता...
*
खाकर चोट न किंचित रोता,
दुःख-विपदा में धैर्य न खोता.
आह न भरता, वाह न करता-
नहीं मलिनता ही वह धोता..
अगर हृदय पत्थर का होता...
*
कुसुम-परस पा नहीं सिहरता,
उषा-किरण सँग नहीं निखरता.
नहीं समय का मोल जानता-
नहीं सँवरता, नहीं बिखरता..
अगर हृदय पत्थर का होता...
*
कभी नींव में दब दम घुटता,
बन सीढ़ी वह कभी सिसकता.
दीवारों में पा तनहाई-
गुम्बद बन बिन साथ तरसता..
अगर हृदय पत्थर का होता...
*
अपने में ही डूबा रहता,
पर पीड़ा से नहीं पिघलता.
दमन, अनय, अत्याचारों को-
देख न उसका लहू उबलता.
अगर हृदय पत्थर का होता...
*
आँखों में ना होते सपने,
लक्ष्य न पथ तय करता अपने.
भोग-योग को नहीं जानता-
'सलिल' न जाता माला जपने..
अगर हृदय पत्थर का होता...
*

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5 टिप्पणियाँ

  1. यह कविता बिल्कुल लयात्मक है, मीटर या बहर संतुलित है |

    सार्थक रचना के लिए आचार्यजी को बधाई |

    अवनीश तिवारी

    मुम्बई

    जवाब देंहटाएं
  2. कुसुम-परस पा नहीं सिहरता,
    उषा-किरण सँग नहीं निखरता.
    नहीं समय का मोल जानता-
    नहीं सँवरता, नहीं बिखरता..
    अगर हृदय पत्थर का होता...

    बहुत सुन्दर गीत

    जवाब देंहटाएं
  3. जरूर कुछ उपयोगी पत्थर हृदयी भी हैं ।वहीं शिखर पर हैं ।कल्पना लयात्मक व गेय शब्दों के संयोग से सुंदर अभिव्यक्ति बनी हैं ।बधाई ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूब । प्रेरणादायक ।

    जवाब देंहटाएं

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