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गुनहगार [लघुकथा] - अवनीश तिवारी

मिशल फ़र्नान्डिस सहमी और चिंता की निगाहों से अपने १२ बरस के बेटे ( ?) रोनी को चर्च की उतरती सीढ़ियों पर उछलते देख रही थी | पास बैठे रोनी के पिता जॉन ढलती शाम के साथ खामोश हो रहे आसमान की ओर मुंह उठाये , थके मन से कुछ सोच रहे थे |
भाग्य से रूठे यादों ने बरसों पुरानी बातों को खुरेद कर रख दिया और फिर नापसंद घटनाओं की छवियाँ एक - एक कर सामने आने लगी |

१२ बरस पहले रोनी का जन्म लेना, मिशल का दुखभरी मातृत्व का निर्वाह करते रहना , जॉन और मिशल का हर कदम रोनी को किसी तीसरे से मिलने - जुलने को टालना ,रोनी को दूर क़स्बे के स्कूल में भेजना , कुछ लोगों को पता चलने पर जॉन का अपने बैंक मेनेजर के पोस्ट से तबादला लेकर किसी दूसरे राज्य में आ बसना, हर कदम रोनी की निगरानी करना ... और बहुत कुछ ...|

रोनी के नपुसंक होने की समस्या आज भी उनके जीवन में पल और बढ़ रही है | दोनों किसी गुनहगार के तरह समाज में छिपे-छिपे रह रहें हैं, जी ( ? ) रहें हैं |

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