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[भाषा सेतु] - लाला जगदलपुरी के दोहे

[दोहे मूल हलबी बोली में तथा उनका अनुवाद]
मूँड आय मोचो सरग, आरू धरतनी पायँ।
दूनोंचो सौकार मयँम कमया माने आयँ।
सिर मेरा आकाश है, और धरती पाँव। मैं दोनो का साहूकार हूँ, कमाऊ आदमी हूँ।
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नाँगर, बैला, भुईं चो, कोन धरेसे नावँ।
कमया चो कमई चलो, जियो देस चो गाँव। 
हल बैल और भूमि को, कौन पूछता है? कमाऊ की कमाई चले, जियें देश के गाँव।
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कुकडा केबे बालसी, केबे होली, साँज।
कमया नीं जाने असन, बूता धरली माँज। 
मुर्गा कब बोला, कब साँझ हुई? मेहनती नहीं जागता, मेहनत का नशा एसा गहराया।
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काटुन काटुन धान धन, मारुन मारुन बेठ।
कमया मन डँड पावला, पुटका बनली सेठ। 
धान धन काट काट कर गुमेट गुमेट कर बैठ मजदूरों नें कष्ट साध्य परिश्रम किया, और ‘पुटका’ बन गया सेठ।
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काम कमानी गाँव चो, आरू सहर चो गोठ।
’गजा मूँग बदला दुनों, जिनगी होली मोठ। 
काम कमाई गाँव की और शहर की बात। दोनो गजामूँग (मीत) हो गये, एसी स्थिति में, ज़िन्दगी जो दुबली थी वह मोटी हो गयी।
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लकड़ी गोटक रान चो, कुरची बनली काय।
माची मन के आपलो, निरने नायँ चिताय। 
एक जंगल की लकड़ी कुर्सी क्या बन गयी वह अपनी माचियों को बिलकुल नहीं पहचानती।
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सहरे जाउन खादलो, मिठई मंगल साय।
लेका काजे आनलो, लाई चला छुचाय। 
शहर में जा कर, मंगलसाय ने मिठाई खा ली। और अपने लडके के लिये सिर्फ चना लाई खरीद लाया।
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बोबो खाउन लाडरा, पाउन पाउन लाड़।
एबे सब चो भूत के, खेदेसे बटपाड़। 
रोटी खा कर लाडला पा पा कर लाड। सब के भूतों को खदेडता सुर चढा, सिरहा हो गया।
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मँदहा मँदहा हाट ने, बिकुन खादला लाज।
मुँडे अकरली बेसरम, तिहँके होली ताज। 
हाट में शराबी लोग शर्म को बेच कर खा गये। सिर पर बेशर्म उग आया उन्हें वह ताज हो गया।

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3 टिप्पणियां

  1. अच्छे दोहे ...लाला जी ने हिन्दी -हल्बी ग्रामर भी लिखी है , इस किताब में उन्होंने हल्बी - हिन्दी में वाक्य भेद एवं शब्द भंडार पर विस्तृत चर्चा की है

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत समय बाद फिर से साहित्य शिल्पी लाला जगदलपुरी को ले कर आयी है इनको पढना सुकून देता है।

    जवाब देंहटाएं

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