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संपादकीय - अंक १४ मई, २०१२ [मंटो विशेष]

बीती ग्‍यारह मई को मंटो का जन्मदिन था। वे होते तो सौ बरस के होते। लेकिन इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वे महज 42 बरस जीये। लेखक वैसे भी न तो मरता है और न ही अपने पाठकों की स्‍मृतियों से दूर ही जाता है। पिछले दो दिन से सब जगह यही पढ़ रहा हूं कि वे होते तो और धमाकेदार लिखते रहते और सरकार की, कट्टरपं‍थियों की और अपने आलोचकों की नाक में दम किये रहते। उन पर बस बीस मुकदमें और ठुक चुके होते और वे अपने फुलटाइम लेखन में से उनकी तारीखें भुगतने के लिए अदालतों के चक्‍कर काट रहे होते। एक बात और भी होती शायद कि तब तो वे अपनी बिन लिखी कहानियों के लिए पेशगी पैसे ले आया करते थे और बाद में कहानियां लिखने के लिए जद्दोजहद करते रहते थे। अब होते तो अपनी किताबों की रायल्‍टी के लिए प्रकाशकों के चक्‍कर ज़रूर लगा रहे होते।

साहित्यशिल्‍पी का यह अंक उन्‍हीं की स्‍मृति को समर्पित है। विरासत में उनकी कहानी, साक्षात्‍कार में उनकी बेटी नकहत द्वारा बीबीसी को दिया गया साक्षात्‍कार, खुद मंटो की कलम से कि मैं क्‍यों लिखता हूं और मैं अफसाना क्‍योंकर लिखता हूं, उनकी कुछ लघुकथाएं और चर्चित कहानियां तो हैं ही सही इस अंक में, उनके अभिन्‍न मित्र कृशनचंदर ने उनके जनम दिन पर दो रोचक किस्‍से लिखे थे, वे भी पाठक आज के अंक में पढ़ेंगे। संयोग से कृशनचंदर ने ही उनकी मृत्‍यु पर बेहद मार्मिक लेख लिखा था। पाठकों के लिए हमने वह भी जुटाया है।

हमारे प्रिय कवि मित्र प्रेम चंद गांधी अपनी दो पाकिस्‍तान यात्राओं के दौरान किस तरह से मंटो की कब्र पर जाने के लिए छटपटाते रहे और आखिर मंटो के घर जा पाये, इसको बेहद पठनीय लेख में उन्‍होंने विशेष तौर पर हमारे लिए लिखा है। पाठकों को पसंद आयेगा। देस परदेस में कराची की अतिया दाउद की कविताएं, भाषा सेतु में प्रसिद्ध बांग्‍ला कवि शक्ति चट्टोपाध्‍याय की कविताएं, हिंदी में शैफाली नायिका की कविताएं हैं तो आओ धूप में इस बार अपनी आंखों की ज्‍योति खो चुके गौरव शुक्‍ला की कविताएं हैं।

मैंने पढ़ी किताब में भी गुनहगार मंटो ही हैं। ई बुक उपहार में इस बार मंटो की ही रचनाएं पाठकों को भेंट स्‍वरूप दी जा रही हैं। आखिर में, मंटो से जुड़ा हमारा खुद का अनुभव। पत्रिका के संपादक राजीव जी देहरादून के जिस टाइपिंग सेंटर से सामग्री टाइप कराते हैं, जब वहां पर वे मंटों की कहानियां टाइप कराने गये तो सेंटर के मालिक ने हाथ खड़े कर दिये – साब, हमारे यहां टाइपिंग का काम लड़कियां करती हैं। हम उनसे ये कहानियां टाइप नहीं करवा सकते। सुन रहे हैं मंटो जी आप, हम नहीं सुधरेंगे। बेशक आज आप सौ बरस के होते, हम अभी भी अपने वक्‍त से बहुत पीछे चल रहे हैं।
आपकी प्रतिक्रियाओं, रचनाओं, सुझावों और अभिमतों का इंतज़ार रहेगा।

सूरज प्रकाश

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4 टिप्पणियाँ

  1. अपने मंटो पर आधारित विशेषांक पर सामग्री जुटाने के लिए बहुत मेहनत की है.सभी स्तंभ शानदार हैं. आपकी पत्रिका लोगों द्वारा खूब पढ़ी और सराही जा रही है.कल तेजेन्द्रजी भी बता रहे थे कि उन्होंने मृदुला गर्ग पर मेरा लेख साहित्य शिल्पी में पढ़ा है.कोई कमेन्ट या लाइक न भी करे मगर पत्रिका पर लोगों का ध्यान जा रहा है बड़ी बात है.

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  2. मंटो पर यह विशेशंक बहुत स्तरीय और दिलचस्प है.उनके व्यक्तित्व और लेखन से जुड़े अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है.

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  3. मंटो पर यह विशेशंक बहुत स्तरीय और दिलचस्प है.उनके व्यक्तित्व और लेखन से जुड़े अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है.

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  4. महोदय आपको बहुत -बहुत धन्यवाद की आपने मंटो जी पर विशेषांक निकालने का सफल प्रयास किया , जबकि कुछ दिनों से तथाकथित प्रतिष्ठित पत्रिकाओ का तमगा लगाये कुछ पत्रिकाए सिर्फ अपने मठाधीशो को खुश रखने के लिए उन्ही पर केन्द्रित होकर यशोगान करने से नहीं अघाती ,,,,,

    आपका प्रयास सार्थक हो प्रभु से यही प्रार्थना है ....

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