एक अनोखी घटना घटी है। मंटो मर गया है। यों तो वह एक अरसे से मर रहा था। कभी सुना कि वह पागलखाने में है। कभी सुना कि वह ज्यादा शराब पीने से अस्पताल में पड़ा है। कभी सुना कि उसके यार दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। कभी सुना कि वह और उसके बच्चे फाकाकशी कर रहे हैं। बहुत सी बातें सुनी हमेशा बुरी बातें सुनीं, लेकिन विश्वाश नहीं हुआ; क्योंकि इस समय भी उसकी कहानियाँ बराबर छपती रहीं; अच्छी कहनियाँ भी और बुरी कहानियाँ भी; जिन्हें पढ़कर मंटो का मुंह नोचने को जी चाहता था, ऐसी कहानियाँ भी जिन्हें पढ़कर मुहं चूमने को जी चाहता था.....
मगर आज रेडियो पाकिस्तान ने यह ख़बर सुनाई कि मंटो धड़कन बंद हो जाने से चल बसा तो दिल और दिमाग चलते चलते एक क्षण के लिए रुक गए.....
मेरी आँख में आंसू का एक कतरा भी नहीं है, मंटो को रुलाने से अत्यन्त घृणा थी। आज मैं उसकी याद में आंसू बहाकर उसे परेशान नहीं करूँगा। आहिस्ते से अपना कोट पहन लेता हूँ और घर से बाहर निकल जाता हूँ।
सब जगह उसी तरह काम हो रहा है। आल इंडिया रेडियो भी खुला है और होटल का बार भी और उर्दू बाजार भी; क्योंकि मंटो एक बहुत मामूली आदमी था। वह एक गरीब कहानीकार था, वह कोई मंत्री नहीं था जो उसकी शान में झंडे झुका दिए जाते। आल इंडिया रेडियो भी खुला है; जिसने कि सैकड़ों बार उसकी कहानियों के ध्वनि नाट्य रूपांतरण किये हैं, उर्दू बाजार भी खुला है, जिसने उसकी हजारों किताबें बेचीं हैं और आज भी बेच रहे हैं। आज मैं उन लोगों कहकहा लगाकर देख रहा हूँ, जिन्होंने मंटो से हजारों रुपये की शराब पी है...
लोगों ने गोर्की के लिए अजायब घर बनाये, मूर्तियाँ बनाईं, शहर बनाये और हमने मंटो पर मुक़दमे चलाये, उसे भूखा मारा, उसे पागल खाने पहुँचाया, उसे अस्पतालों में सड़ाया और यहाँ तक मजबूर कर दिया कि वह किसी इंसान को नहीं शराब की बोतल को अपना दोस्त समझने को मजबूर हो जाये। हम इंसानों के नहीं मकबरों के पुजारी हैं। दिल्ली में मिर्जा गालिब की फिल्म चल रही है, इस फिल्म की कहानी इसी दिल्ली के मोरी गेट में बैठ कर मंटो ने लिखी थी...मंटो दुबारा पैदा नहीं होगा यह मैं भी जानता हूँ और राजेन्द्र सिंह बेदी भी, अस्मत चुगताई भी, ख्वाजा अहमद अब्बास भी और उपेन्द्रनाथ अश्क भी।
1 टिप्पणियाँ
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