रमेश उपाध्याय
पहले शिवराम और कुबेर दत्त...और आज अरुण प्रकाश भी चले गये. उनकी पहली कहानी 'कहानी नहीं' जब मैंने 'कथन' में प्रकाशित की थी, तब उनसे मेरा कोई निजी परिचय नहीं था. लेकिन बाद में वे साहित्यिक और सामाजिक स्तर पर ही नहीं, पारिवारिक स्तर पर भी मेरे आत्मीय हो गंये थे...मैं नहीं जानता कि छोटे भाइयों को 'श्रद्धांजलि' कैसे दी जाती है...।
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नरेंद्र तोमर 
विश्वास नहीं होता कि अब मैं उनसे कभी नहीं मिल पाउंगा। लगभग 25 साल तक मैंने उन्हें करीब से देखा था....।
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प्रज्ञा रोहिणी 
कहानी नहीं आज भी मेरे जेहन में उतनी ही ताज़ा है जितने अरुण प्रकाश अंकल ....याद आता है उनका आपको सम्मान देते हुए भाईसाहब कहना...और ये चित्र ....उस दिन इस कार्यक्रम का संचालन मैं कर रही थी और वो आपकी कहानियों के शिल्प पर बोले थे।
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विवेक निराला 
अपने प्रिय कथाकार को विनम्र श्रद्धांजलि !
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नंद भारद्वाज 
अरुण जी को लेकर यह चिन्ताज तो अरसे से बनी हुई थी, भाभी और उनकी बेटी दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहती थीं, पिछले ढाई-तीन साल इस जुझारू रचनाकार ने जिस तरह से गुजारे हैं, उन्हेंे देखकर चिन्ताे के बावजूद हिम्मलत बढ़ती थी। वे बेशक हमारे बीच से विदा हो गये हों, लेकिन उनका कथा-साहित्य  और महत्तिर लेखन हमारा मार्ग रौशन करता रहेगा। अरुण जी को नमन।
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ऋषिकेश सुलभ 
भैया एक्सदप्रेस, जलप्रांतर, मैंने लाखों के बोल सहे, मंझधार कि‍नारे, वि‍षम राग जैसे कथा संकलन.....कोंपल कथा उपन्या‍स। .....। उन्हों ने अपनी कहानी 'बेला एक्का  लौट रही हैं' में लि‍खा था - ''छोटे लोगों के सपने बड़े लोगों के जूते की नोक पर टि‍के रहते हैं। जरा मस्तीक में पैर ही झटक दि‍या, सपनों का शि‍राजा बि‍खर जाता है।''
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नवेंदु कुमार सिन्हा 
भैया खुद ऐक्समप्रेस बन कर बहुत दूर निकल गये! नव जनवादी मोर्चा के वे हमारे साथी थे1 संस्थाुपकों में भी, बाद में जन संस्कृेति मंच खड़ा किया हमने। देसी मिजाज़, देसी शैली, ज़मीनी सोच के साथी का यूं चले जानाबेचैन करकता है। साथी को श्रद्धां‍जलि। 
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अनिल जनविजय 
अरे ! मैं कल ही उनकी कहानी ’नहान’ पढ़ रहा था और उन्हें याद कर रहा था। अब तक सौ बार तो पढ़ी होगी यह कहानी। मेरे प्रिय लेखक थे। ख़ूब याद आएँगे। ’श्रद्धांजलि’ लिखते हुए उँगलिया भी काम नहीं कर रहीं।
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शरद कोकास
बहुत दुखद समाचार ..। अरुण जी को विनम्र श्रद्धांजलि
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ओमा शर्मा 
मुम्बई के नवभारत टाइम्स में अरुणजी के निधन की कोई खबर नहीं है जबकि इसके संपादक एक कवि-लेखक हैं...भला हो इस दुनिया का जहां बहुत सारे अनर्गल के बीच जरूरी खबरें मुहैया हो जाती हैं. 'NBT' को तो कल से बन्द कर ही रहा हूं, एक व्यक्ति को मित्र सूचि से बाहर कर रहा हूं।
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भीखी प्रसाद वीरेंद्र 
सृष्टि के नियम का पालन करते हुए सबको एक दिन सब कुछ छोड़-छाड़ कर इसी तरह चला जाना होगा। मैं भी चला जाऊँगा एक दिन ... सबको एक दिन जाना ही जाना है।
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राकेश कुमार पालीवाल
अरुण प्रकाश का निधन तो अत्यन्त दुखद है ही लेकिन एक महत्वपूर्ण लेखक का हिन्दी अखबारों मे मृत्योपरान्त खबर न बनना और भी चौंकाता है।
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गोविंद माथुर 
बेहद दुखद सुचना. अरुण प्रकाश एक अच्छे कहानीकार ही नहीं बेहद अच्छे इंसान भी थे।
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प्रदीप सौरभ
आखरी मुलाकात में आक्सीजन की नली लगाए घर पर बैठे थे...मुझे देख कर खुश हुए...थोडी देर इधर उधर की करने के बाद उनके चेहरे में एक खास तरह की चमक उभर आई थी और उन्होंने अपनी नाक की नली निकाल दी थी...बोले थे ये सब बेमानी है तुम लोग आ जाते हो यही मेरी बीमारी का इलाज है...अंत में उनसे मिलने वालों की संख्या काफी कम हो गई थी...मैं भी चाह कर ज्यादा नहीं जा पाता था...दिल्ली शहर नहीं स्लाटर हाउस है, जहां रिशतों की अहमियत नहीं है...एक अच्छे  दोस्त के न रहने पर बेहद अफसोस है...विनम्र श्रद्धांजलि।
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ऋषि चौबे 
अरुण जी ने 'नहान' कहानी सुनाई थी .अकादमी के सभागार में .आपसे पहले जोशी जी (शेखर) ने 'दूसरा घर '.दूसरा घर के बाद लगा नहीं था कि कोई और कहानी आज जमेगी .पर ...."नहान " जमी हुई है .आपकी छवि एक सादे साफ लेखक की है, मेरे मन में .आपकी खाँसी और बीड़ी दोंनों साथ -साथ याद रहती है .मैंने आपको बस एक बार सुना है, एक बार थोडा बतियाया है .बस...पर कल से मन दुखी ऐसे है ......मानो आप मेरे घर के थे . नमन !!!
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नरेश चंद्रकर 
अरुण जी ने मुझे कविता के गुर सिखाए थे अलवर मे एक बार भेंट मे ...... उन्हें खो कर दुखी हूँ। 
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प्रेम चंद गांधी 
अरुण प्रकाश का हमारे बीच से यूं चले जाना हिंदी साहित्य के लिए प्रचलित अर्थों में रस्मी किस्म की अपूरणीय क्षति नहीं है, बल्कि सही मायनों में देखा जाए तो ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई मौजूदा हालात में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। मैंने उन्हेंएक सिद्धहस्त कथाकार ही नहीं वरन ऐसे कई रूपों में देखा-जाना है, जिन्हें समझे बिना असली अरुण प्रकाश को नहीं जाना जा सकता।
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रंजना जायसवाल 
अरुण जी का जाना दुखद है |
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संदीप शर्मा 
प्रकाश की गति को मापना कठिन कार्य है .. आपने खबर दी है .. शोक व्यक्त करते है / साहित्य से जुडी नायाब तस्वीरें आप से मिल जाती है / धन्यवाद का पर्यावाची तलाश रहा हूं जो आपको अभी नहीं मिला है।
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नंद भारद्वाज 
प्रेमचंद ने अरुण प्रकाश के रचनाकर्म और उनके व्यक्तित्व/ पर बेहद आत्मीय टिप्पणी लिखी है। वे वाकई हिन्दी की जातीय परंपरा के एक बेजोड़ रचनाकार थे, उनका अनुभव-संसार इतना व्यापक था और लोक-संवेदना के भीतर पैठ इतने गहरी थी कि उनकी कहानियां हमारे समय का दस्तावेज लगती हैं। वरिष्ठं कथाकार कमलेश्वतर के साथ भी उन्होंने पटकथा लेखन के क्षेत्र मे कई महत्व‍पूर्ण कहानियों की पटकथाएं तैयार कीं, साहित्य अकादमी की मुख पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' को जो स्तर और स्वरूप उनके संपादन में मिला, वह अपने आप में एक मिसाल है। ऐसे ऊर्जावान रचनाकार का चले जाना वाकई इतनी बड़ी क्षति है, उसका अनुमान कर पाना कठिन है।
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मिसिर अरुण 
अरुण जी हिन्दी कहानी की स्वयं में एक परंपरा थे ! उनकाजना हिन्दी साहित्यकी एक अपूर्णीय क्षति है ! उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि! 
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अतुल चतुर्वेदी 
सामर्थ्यवान कथाकार एवं संपादक का निधन अपूरणीय क्षति है , श्रद्धाजंलि।
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हरि ओम राजोरिया
मुझे दुख है, कि मैं दिल्ली जकर भी उनसे मिल नहीं पाया।
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अकबर रिज़वी 
उनके जाने से जो ख़ला पैदा हुआ है, वो भरना मुमकिन नहीं है। वैसे उनकी कृतियां हमारे बीच उनके होने, बने रहने का प्रमाण हैं।
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रति सक्सेना 
ओह, दुखद खबर है। उनसे बहुत ज्यादा मुलाकातें तो नहीं हुईं, लेकिन जब भी हुई, उनकी जानकारी के खजाने से काफी कुछ सीखने को मिला। 
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सुभाष नीरव 
मैं उनकी ओर उनकी कहानियों की वजह से आकर्षित हुआ था और फिर मिलना- जुलना भी होता रहा। मुझे उनकी साफ़गोई बहुत पसन्द रही। जो उनको सही लगता था, खुलकर कह देते थे। समकालीन कहानीकारों में वह मुझे बेहद प्रिय रहे हैं… उनके जाने की सूचना ने मन को दुखी किया है…मेरी विनम्र श्रद्धांजलि !
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मूल चंद गौत
अरुण भाई के न रहने की खबर ने हिला दिया वे कुछ अलग करना चाहते थे हमेशा।
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सूरज प्रकाश 
हमारे बेहद प्रिय कथाकार मित्र अरुण प्रकाश नहीं रहे। वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे। वे जुझारू, मेहनती और बुलंद हौसलों वाले कथाकार थे। सरकारी नौकरी में विकलांग व्यक्तियों के लिए कुछ प्रतिशत पद रखने की शुरूआत के पीछे उनका भी हाथ था। इसके लिए वे एक बार राष्ट्रपति से भी मिलने गये थे। जब राष्ट्रपति के सचिव ने पूछा कि राष्ट्र्पति को आपसे क्यों  मिलना चाहिये तो अरुण जी का जवाब था - क्योंकि वे देश के प्रथम नागरिक हैं और मैं देश का आम नागरिक हूं। इसी बात पर उन्हें राष्ट्रपति से मुलाकात की अनुमति मिल गयी थी। वे अपने लेखन को ले कर भी उतने ही खुद्दार थे। एक बार हॅस से उनकी कहानी राजेन्द्रक यादव जी ने यह कह कर लौटा दी थी कि कहानी का शीर्षक बदल दो तो हम कहानी छापेंगे तो अरुण जी ने जवाब दिया था कि मैं कहानी का शीर्षक बदलने के बजाये अपनी कहानी के लिए संपादक बदलना पसंद करूंगा। और वह कहानी उन्होंने हंस से ले कर कहीं और छपवायी थी। उनसे जुड़ी तमाम बातें याद आ रही हैं। हमारी विनम्र स्मृति। उनके लेखन, व्य वहार, जीवन, काम, और संबंधों में एक अलग ही तरह का अपनापन, एक कशिश रहा करती थी और उनसे मिलने के बाद उनसे घंटों बतियाया जा सकता था। वे हमें कहीं भी छोटा महसूस नहीं होने देते थे।
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