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‘त्रिजुगी कौशिक’ की कविता ‘हाट बाजार’



रैयमति
सिर पर टोकरी रखे
गोद में बच्चा बाँधे
आती है हाट

देखती पगडंडी को
जो जुडती है सडक से
सोचती है
क्या सभ्यता और विकास
इसी रास्ते से आयेंगे

वह आंकती है
चिरौंजी के दाम
नमक के बदले
कोसों पैदल चल कर आती है

हाट
क्या लेनदेन की जगह भर है
यहीं से होता है
शोषण का सिलसिला
खत्म भी यहीं से होगा
क्योंकि वे हाट में
सिर्फ सल्फी-लांदा नहीं पीते
पीते हैं एक कड़वा घूँट भी।

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