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देस-परदेस में ‘तस्लीमा नसरीन’ की कवितायें



कलकता इस बार… 

इस बार कलकता ने मुझे काफ़ी कुछ दिया,
लानत-मलामत; ताने-फिकरे,
छि: छि:, धिक्कार,
निषेधाज्ञा
चूना-कालिख, जूतम्-पैजार

लेकिन कलकत्ते ने दिया है मुझे
गुपचुप और भी बहुत कुछ,
जयिता की छलछलायी-पनीली आँखें
रीता-पारमीता की मुग्धता
विराट एक आसमान, सौंपा विराटी ने
2 नम्बर, रवीन्द्र-पथ के घर का खुला बरामदा,
आसमान नहीं तो और क्या है?

कलकत्ते ने भर दी हैं मेरी सुबहें,
लाल-सुर्ख गुलाबों से,
मेरी शामों की उन्मुक्त वेणी, छितरा दी हवा में.
हौले से छू लिया मेरी शामों का चिबुक,
इस बार कलकत्ते ने मुझे प्यार किया खूब-खूब.
सबको दिखा-दिखाकर,
चार ही दिनों में चुम्बन लिए चार करोड्.

कभी-कभी कलकत्ता बन जाता है,
बिल्कुल सगी माँ जैसा,
प्यार करता है, लेकिन नहीं कहता, एक भी बार,
कि वह प्यार करता है.
चूँकि करता है प्यार, शायद इसीलिये
रटती रहती हूँ-कलकत्ता! कलकत्ता!

अब अगर न भी करे प्यार,
भले दुरदुराकर भगा दे
तब भी कलकत्ता का आँचल थामे,
खडी रहूँगी, बेअदब लड्की की तरह!
अगर धकियाकर हटा भी दे,
तो भी मेरे कदम नहीं होंगे टस से मस!
क्यों?
प्यार करना क्या अकेले वही जानता है, मैं नही?

अनुवाद : सुशील गुप्ता 
=====

पिता, पति, पुत्र

अगर तुम्हारा जन्म
नारी के रूप मे हुआ है तो
बचपन में तुम पर
शासन करेंगे पिता
अगर तुम अपना बचपन
बिता चुकी हो
नारी के रूप में
तो जवानी में तुम पर
राज करेगा पति
अगर जवानी की दहलीज़
पार कर चुकी होगी
तो बुढ़ापे में
रहोगी पुत्र के अधीन

जीवन-भर तुम पर
राज कर रहे हैं ये पुरुष
अब तुम बनो मनुष्य
क्योंकि वह किसी की
नहीं मानता अधीनता -
वह अपने जन्म से ही
करता है अर्जित स्वाधीनता

अनुवाद : शम्पा भट्टाचार्य

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2 टिप्पणियां

  1. तसलीमा नसरीन जी का गद्य ही पढ़ा था, कविताएं पहली बार पढ़ी, कलकत्ते पर लिखी उनकी कविता वास्तव में उनके इस नगर से आत्मीय जुड़ाव को ही प्रदर्षिषित करती है, समस्या कलकत्ता से नहीं धार्मिक कट्टर वाद से है जो कि अब भारत क्या दुनिया के हर कोने में देखा जा सकता है, तसलीमा जी को उनकी कविताओं के लिए बधाई.....

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