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आओ धूप में सपना मांगलिक की कवितायें




आइना 

आईना भी मुझे पहचानने से इनकार कर रहा
ये किस बहरूपिये सा वेष धर लिया मैंने
निकली तो थी कुछ और ही करने को मैं
ये क्या हुआ मुझे ये क्या कर लिया मैंने
चली थी नाम कमाने दिल के जहां में
इश्क में खुद को ही बदनाम कर लिया मैंने
फैंका फरेब का तेजाव मेरे चेहरे पे उसने यूँ
खूबसूरत प्यार में खुद को बदशक्ल कर लिया मैंने
ये उस खुदगर्जी की सजा है जो सोचा अपने बारे में
हक-ऐ जिंदगी माँ –बाप को ना अदा किया मैंने
नफरत करता है जहाँ ना रोयेगा मेरी मैयत पे
चलो आंसू हर एक आँख का बचा लिया मैंने
जिन दुआओं पे हक था मेरा किसी और के काम आयेंगी
यही सोच टूटे दिल को बहला लिया मैंने
ना किसी और कि खता है सब किया है मेरा
जो बोया था कल आज उसी को काटा मैंने
मेरी तवाही से कुछ तो सबक सीखेंगे लोग
इसलिए जिंदगी को अपनी खुलीं किताव बनाया मैंने
अफ़सोस बहुत मगर एक तसल्ली भी है
जो भी हो खुद को एक बार तो आजमाया मैंने
जिंदगी के पीछे तो सभी भागते है लोग
फक्र है जिंदगी से भाग मौत को गले लगाया मैंने
किया कुछ बुरा तो सिर्फ अपना बुरा किया
इंसानियत का हर फर्ज दिल से निभाया मैंने

आंसू गिराओ ना 

अपने आंसुओं को संभालो ,गिराओ ना
कल अंखियों की सीपी में ये रहे ना रहे
मोती हैं कीमती इन्हें व्यर्थ लुटाओ ना
बादलों कि कद्र होती है सिर्फ सावन में
कह दो उमड़ते बादलों से वो थम जाएँ
यूँ रिमझिम मेघ इनसे बरसाओ ना
जीवन है अनमोल एक रस मधुर
दुःख सारे घोल के पी जाओ
गरल बन जाएगा सुधा “सपना”
इसकी कड़वाहट से घबराओ ना
मांझी रूठ गया तो क्या
कश्ती टूट गयी तो क्या
हौसलों को पतबार बनाकर
साहिल तक आ जाओ ना

बगावत 

डूबे रहते हैं हरबक्त ख्यालों में उनके
उनका तसब्बुर ही इबादत हो गयी है
लोग कसने लगे ताना मेरी बेखयाली पर
कहते हैं हमे बुतपरस्ती की आदत हो गयी है
कैसे समझाऊं उन्हें बड़े ही नासमझे हैं वो
कुछ और नहीं हमें उनकी चाहत हो गयी है
घटायें सावन की बनके बरसे वो
यूँ मेरी सहरा सी जिंदगी में
बंजरे ऐ दिल खिल उठा यूँ
रूह को मिला चैन बड़ी राहत हो गयी है
आज किस्मत बनी रकीव फिर “सपना ‘
छेड़ दी जंग संग जज्बातों के उसने
लो शुरू तकदीर की बगावत हो गयी है
                             
गुरूरत 

रो रोकर जीवन गुजारने की
आखिर क्या जरूरत है
हंस कर जीवन जीना सीखो
ये जिंदगी बहुत खूबसूरत है
लाख चौरासी जन्मों के बाद
है मिला तुम्हे अनमोल जन्म
नही बुरा ये किसी भी सूरत
ये तो खुदा की मूरत है
ना शोहरत तेरी बदौलत है
तेरी मर्जी पूछती ना मोहब्बत है
फिर काहे का इतराना “सपना”
फिर काहे की गुरुरत है
ना मिला तो क्यूँ कर हुई मायूस
मिल गया तो कैसे हो गयी खुश
ना जमा तू हक किसी शय पर
तेरी किस्मत पे भी उसकी हुकूमत है

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