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पद्मा मिश्रा की कवितायें

 पद्मा मिश्रा

तुम कोई गीत लिखो

तुम कोई गीत लिखो, और मै गाऊं,
गीत माटी के, गीत फसलों के,
गीत सुबह-शाम ,गोधूली-विहान के.
तुम कोई सूरज गढ़ों, और मै ..
किरणों का परचम सजाऊं,
मन की मञ्जूषा में यादों के साये हैं,
भूले बिसरे नगमे बादल बन छाये हैं,
जीवन के आँगन में तुम,
सावन की पहली फुहार बन बरसो,
और मै बूंदों की पालकी उठाऊं
भावना के मंदिर में देवता विराजे हैं,
प्रिय की अभ्यर्थना में,
साज सभी साजे हैं,
सूने  मन मंदिर में तुम,
पूनम का चाँद बनो,
और मै, आशाओं की चांदनी बिछाऊं,
नदिया ने सीखा है ,केवल बहते जाना,
लहरों की सरगम पर सपने बुनते जाना,
नैनो की गागर में,
सागर सा प्यार लिए,
बादल सा राग बनो,
और मै मनुहारों की रागिनी सुनाऊं,
तुम कोई गीत रचो, और मै गाऊं.

जीवन प्रतीक्षा है

जीवन प्रतीक्षा है आने वाले कल की,
रात के अंधेरों को चीर कभी निकलेगा,
डूबती उम्मीदों में सूरज प्रभात का,
सांसों की डोर पकड़ ,जीवन की आशा में,
रच देंगी किरणें फिर परचम विहान का.
बीतेंगे लम्बी प्रतीक्षा के पल जैसे,
गंध गंध डूबा मन आशा विश्वास का.
अश्रु भरी आँखों में मुस्काएगा सावन,
संवरेगा बगिया में फूलों का फिर बचपन,
पोर पोर निखरेगा जीवन मधुमास का,
पावस के मेघों सी, भींगी हर भावना,
बूंद बूंद संवरेगी संचित हर कामना,
यादों में महकेगा मधुवन परिहास का.
रात के अंधेरों को चीर कभी निकलेगा ,
डूबती उम्मीदों में सूरज प्रभात का.

बिसार नहीं पाती औरत

रसोईं  के धुंआते अंधेरों में,
जलते चूल्हे की रोशनी के बीच,
गर्म पतीले से उठती भाप,
धुंधला कर देती है सब कुछ,
आँखों में आंसुओं की नमी है या धुंए की जलन,
जान नहीं पाती औरत.
मिर्च मसालों में डूब गए सपनो को,
कतरा कतरा तराशती ,
सुबह से शाम तक ,
दौडती भागती जिन्दगी में,
 कहाँ खो गयी है कविता ?
ढूंढ़ नहीं पाती. औरत.
अक्षर अक्षर संजोती,
मन की मञ्जूषा में,
जिन्दगी के ढेरों सपने सजाती औरत,
पहचान नहीं पाती क़ि,
करछी की धार तेज है या. कलम?
पेट की ज्वाला में भस्म होती --,
क्षुधा तन-मन की ,
बिसार नहीं पाती औरत.

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