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वर्ष छ:, अंक – 22


विरासत में 'भीष्म साहनी' की कहानी 'चीफ़ की दावत'    
शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को पसीना पोंछने की फुर्सत न थी। पत्नी ड्रेसिंग गाउन पहने, उलझे हुए बालों का जूड़ा बनाए मुँह पर फैली हुई सुर्खी और.....।
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भाषा सेतु में अमृता प्रीतम की कवितायें
जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
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बात साहिर लुधियानवी की
साम्यवादी विचारों से प्रेरित साहिर लुधियानवी नें अनेको उर्दू पत्रिकाओं का संपादन किया जिनमें अदब-ए-लतीफ़, शाहकार, शाहराह आदि प्रमुख हैं। 
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आलोक पुराणिक का व्यंग्य ‘घोटाला ईश्यु ही कहाँ है अब’
खौं-खौं, खाऊं-खाऊं सरकार को हम घेरेंगे, रिटेल सेक्टर में एफडीआई पॉलिसी, डीजल की महंगाई पर धरना, मोरचा, जुलूस होगा। महंगे डीजल से देश तबाह होगा।
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हरिशंकर परसाई की लघुकथा 'अपना पराया'
"आप किस स्कूल में शिक्षक है?"
"मैं लोकहितकारी विद्यालय में हूं। क्यों, कुछ काम है क्या? "
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 'प्राण शर्मा' की दो लघुकथाएं
चंद्रप्रकाश के चार साल के बेटे को पंछियों से बेहद प्यार था। वह उन पर अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहता।
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मैने पढी किताब में महेन्द्र भटनागर नें पढी 'पं नरेन्द्र शर्मा कृत प्यासा निर्झर  
प्यासा निर्झरमें श्री॰ नरेन्द्र शर्मा-विरचित एक-सौ-चौंतीस कविताएँ संगृहीत हैं। संग्रह की भूमिका 3 मार्च 1964 को लिखी गई है.....   
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 डॉ. काजल बाजपेयी का आलेख 'कर्म शक्ति आज के दौर में'
ऐसा कहा जाता रहा है कि जो काम करते हैं वे कभी भी किसी से नहीं डरते हैं और जो काम नहीं करते हैं वे ही डरते हैं। 
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अवधेश सिंह की कवितायें
गर्मी लू लपटों  की मारी
बौछारें  न अब तक आई....।
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हिन्दी पर शशांक भारती के कुछ मुक्तक
तुलसी मीरा और जिसमें रसखान मिलते हैं,
प्रसाद, पन्त,निराला और महादेवी के गान मिलते हैं। 

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