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वर्ष छ:, अंक-23



  
विरासत में ‘रामधारी सिंह दिनकर’ की कविता ‘हिमालय’
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद; रे तपी आज तप का न काल
नवयुग-शंखध्वनि जगा रही; तू जाग, जाग, मेरे विशाल।  
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देस-परदेस में ‘कार्ल मार्क्स’ की कविता ‘जेनी के लिये’
सबोधित करता हूँ गीत क्यों जेनी को
जबकि तुम्हारी ही ख़ातिर होती मेरी धड़कन तेज़।
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रूपसिंह चन्देल का यात्रा संस्मरण 'वाह अंबरसर! वाह-वाह वाघा!!'
1977 के अक्टूबर माह की बात है। एक मित्र से यशपाल काझूठा सचप्राप्त हुआ। विभाजन की त्रासदी ने मेरे अंदर हलचल मचा दी।  
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शशि पुरवार की लघुकथाएं  
भोपाल जाने के लिए बस जल्दी पकड़ी और आगे की सीट पर सामान रखा था कि किसी के जोर जोर से रोने की आवाज आई।
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गणेश चतुर्थी पर डॉ. सरस्वती माथुर के ‘हाईकु’
पूज्य गणेश
करते हैं कल्याण/ देव महान।   
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सुबोध श्रीवास्तव की दो कवितायें
तुमने कहा/ कि तुम/ सूरज के पास रहते हुए भी
नहीं भूले/ झोपड़ी का अंधेरा
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आलोक पुराणिक का व्यंग्य 'हिन्दी के ग्लोबल योद्धा'
कल हिंदी दिवस पर कई हिंदी सेवियों से मुलाकात हुई। 2012 में हिंदी सेवी होना आसान काम नहीं है।   
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मजाज़ लखनवी की कुछ नज़्में  
अब गुल से नज़र मिलती ही नहीं अब दिल की कली खिलती ही नहीं
ऐ फ़स्ले बहाराँ रुख़्सत हो, हम लुत्फ़-ए-बहाराँ भूल गए।
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‘आओ धूप’ में पियुष द्विवेदी ‘भारत’ की कहानी ‘नियम’
आज दो दिन हो गए थे उसको गाँव आए! करीब दस साल बाद वो गाँव आया था! इन दस सालों में उसके मम्मी-पापा तो कई बार गाँव आए.....।   

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