खामोश स्वीकार

बिन बरसे नजरों से
ओझिल होते
बादलों का सौतेलापन
सूखा होता सावन
मरुस्थलीय यह मन
प्यास कब तक ढोयेगा
कितना इंतजार संजोयेगा
आशाओं - सपनो
के अपने संसार
कब लेंगे मनचाहा  आकार
अपरिभाषित मौसम
अचिन्हित अपनापन
उगता   भीतर की
माटी पर स्वतः
पल्लवित होता
प्रीत का बिरवा
सा  पहला प्यार
जब एक "शायद"
में बसी
तमाम संभावनाएं
और "न" में
दिखे सैकड़ों स्वीकार
शब्दों की छोटी
जेब में खनकती रहीं
सिक्कों सी अभिव्यक्तियाँ
बन्द होटों में लिपटीं
खामोश  अनुभूतिया
दूर रह कर भी
हम अचानक हैं
कितने पास
जैसे धरती
और आकाश
----

प्यार की कहानी

गुलाब की पंखडियों पर
बैठी चाँदी सी  ओस
रात की बातें बिना बताये
उषा के सुनहरे धागों
से लिपट कर
सुबह ही खो जाती है
देवदारों के झुरमुटों
से गुजरती
पहाड़ी मस्त हवा
हमें देख आपस में
क्या कुछ नहीं बतियाती है
संबंधों की खुशबुओं
को सबसे छुपा कर
गुम हो जाती है
टिप टिप वर्षा की
फुहारों को चीरती
दरवाजे पर खड़ी
लैम्प पोस्ट की
नीली रोशनी
आते जाते क़दमों पर
कुछ कहती नहीं बस
मंद मंद मुस्कराती है
प्यार की कहानी
अव्यक्त रह जाती है
अनुभूति के सहारे
शब्दों की सीढ़ी
चढ़ कर दिल से
होटों तक भी जो
न पहुँच पाए
भावनाओं की  कहानी
कहनी   अक्सर
मुश्किल हो जाती  है
-----

नव गीत - बेटी बरखा

पथराई
 पीहर की आँखें
बूढी मां
 खिड़की से झांके

मौसम सावन का है आया
बेटी बरखा न अब तक आई ...

आगन को
 बूंदों  की आस
अटरिया सूनी
है उदास

गर्मी लू लपटों  की मारी
बौछारें  न अब तक आई....

पीड़ा हूक
सहे अमराई
कोयल कूक
दिखे बौराई

झूला बंधा डाल से कहता
छूटी  न  अब तक तन्हाई....

मौसम सावन
का है आया
बेटी बरखा
न अब तक आई...

द्रोपदी का चीरहरण

धर्त रास्ट्र ,भीष्म के रहते
होता रहा है  आताताइयों
को मजबूत संरक्षण
कौरवों की सभा में
सामाजिकता को
कहाँ मिली शरण ?

तभी तो हुआ
द्रोपदी का चीरहरण
कुसंगति - कुटिलता
को सहयोग देते हैं
अपराध के प्रति
तटस्थता का भाव भरण

तभी आसमां भरभरा
के गिरे
धराशाई होते है
समाज सभ्यता के
पक्के सहारे
हमेशा ही गिरती रही है
वंचनाओं की दरकी दीवारें

कितनी  है लचीली
अंकुशों की पकड़
तभी शायद नहीं होती है
ढीली दुर्योधनों की अकड़

नोच ली जाये गले से
सोने की चैन
लूट ली जाये
सरे आम  अस्मत
कब किस नारी की
फूट जाये किस्मत

यह है रोज का हाल
पता नहीं कहाँ
कौन हो जाये हलाल

दैनिक मुख्य समाचार
प्रथम पेज प्रथम दिन
अख़बार का ब्यवस्था पर  हल्ला ,
समाचार चैनल पर दिखे हाहाकार

इतिश्री शायद बस यहीं
जहाँ  ठहर  जाता है
सजग सामाजिक सरोकार
किसने देखा मुह छिपाए
सिसकियाँ लेता रहा
मां बाप का ह्रदय
पीड़ित का पूरा परिवार
निर्विधन घूमता
है सरे आम  अपराधी
राह भूल जाता है
मानवता का अधिकार
आँख मूंदे रहती है
न्याय पालिका
जन प्रतिनिधियों की
चुनी लोकप्रिय सरकार

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