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माँ, मेरी माँ [कविता] - रचना सागर



एक सवाल जो मैंने पूछा,
फ़िज़ा खामोश हो गई क्यों?
बच्चे जिन्हें माँ की लोरी कभी देती थी सुकूँ
आज वे ममत्व पर भरते है ताने क्यूँ?
जिन्हें माँ अपना दिल कहा करती थी
अपनी भूख से पहले खिलाती थी उनको निवाले
आज वे इक पल माँ के साथ नहीं दिखते।
जिनका, माँ आह भरने से पहले दर्द भांप जाती थी
वे बच्चे माँ की आह पर आवाज तक नही देते।
जिनको, माँ कडी धूप में ऑचल से छाया देती थी
वे बच्चे माँ के ऊपर साये रहने नही देते।
जिन बच्चों की चोट पर खुद दर्द सहती पल पल
वे ही बच्चे दर्द देने से चूकते नही क्यूँ?
बच्चे जिन्हें माँ की लोरी कभी देती थी सुकूँ
आज वे ममत्व पर भरते है ताने क्यूँ?

माँ मेरी माँ मत रोना
मै साथ हूँ तेरे हमेशा रहूँगी
कुछ न कर सकी तो दुआ ही करूँगी
तू सलामत रहे, बस ये माँगा करूगी।



रचनाकार परिचय:-
रचना सागर का जन्म 25 दिसम्बर 1982 को बिहार के छ्परा नामक छोटे से कस्बे के एक छोटे से व्यवसायिक परिवार मे हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा भी वहीं हुई। आरंभ से ही इन्हे साहित्य मे रूचि थी। आप अंतर्जाल पर विशेष रूप से बाल साहित्य सृजन में सक्रिय हैं।

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4 टिप्पणियां

  1. साहित्य शिल्पी पढ़कर मज़ा आ जाता है!

    जवाब देंहटाएं
  2. सुंदर अभिव्यक्ति है, रचना जी! माँ और उसकी ममता के संदर्भ में कुछ भी कहना कम ही होगा।

    जवाब देंहटाएं
  3. माँ का ममत्व शब्द अधूरे पड़ते हैं पर आपकी रचना ने कुछ कतरा भाव दिया।बधाई ।
    छगनलाल गर्ग।

    जवाब देंहटाएं

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