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दग्ध-विदग्ध [कविता]- मनन कुमार सिंह





फूट रही लाली पल-पल,
प्राची से हुआ उजाला,
गयी रात, अब नयी बात,
सौगात लिए आ गया प्रात,
कल की नारी ने आज नये
दिन को बुलावा दे डाला.
देख रहे नर पुंगव कल के,
करामात कुछ कर मल-मल के,
नारी आज चढ़ती हिमालय,
पुन्य-प्रसूता,बनी शिवालय,
गण -गौरव की गाथा लिखती,
मान-सम्मान पर मरती दिखती,
मर्दित-समर्पित कल की रातें,
गाँठ लगा, हुईं कल की बातें,
दिशा-दिशा वह करती जय है,
विश्वासभरी, अचल, निर्भय है,
धरती-सी वह सबकुछ ढोती,
सृष्टि-बीज बन ललना बोती,
दाग-दग्ध अब रह नहीं सकती,
कुछ भी कर दो, सह नहीं सकती,
जलते जो उसके अरमान,
साहस और विश्वासभरी वह 
करती कैसा शर-संधान!
खंडित मद, विखंडित पौरुष,
जलता तेरा स्वप्न-वितान !
जलता तेरा स्वप्न-वितान !
करती कैसा शर-संधान !
उर्जस्वित नारी महान !
उर्जस्वित नारी महान !

रचनाकार परिचय:-


मनन कुमार सिंह संप्रति भारतीय स्टेट बैंक में मुख्य प्रबन्धक के पद पर मुंबई में कार्यरत हैं।
सन 1992 में मधुबाला नाम से 51 रुबाइयों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ,
जिसे अब 101 रुबाइयों का करके प्रकाशित करने की योजना है तथा कार्य प्रगति पर है भी।
अधूरी यात्रा नाम से एक यात्रा-वृत्तात्मक लघु काव्य-रचना भी पूरी तरह प्रकाशन के लिए तैयार है।
कवि की अनेकानेक कविताएं भारतीय स्टेट बैंक की पत्रिकाएँ; जाह्नवी’, पाटलीपुत्र-दर्पण तथा  स्टेट बैंक अकादमी गुड़गाँव(हरियाणा) की प्रतिष्ठित गृह-पत्रिका गुरुकुल में प्रकाशित होती रही हैं।

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