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ठंडक है अंगारों में [गज़ल]- सतीश सक्सेना


हमने हाथ  लगाकर देखा , ठंडक है , अंगारों में !

आज रहा मन उखड़ा उखड़ा,महलों के,गलियारों में !
जी करता है,यहाँ से निकलें, रहें कहीं अंधियारों में ! 

कभी कभी,अपने भी, जाने क्यों  बेगाने लगते हैं  ?
आज हमें ,आनंद न आये ,शीतल सुखद बहारों में ! 

वे भी दिन थे,जब चलने पर,धरती कांपा करती थी,
मगर आज,वो जान न दिखती,बस्ती के सरदारों में !

बार बार, जंतर मंतर पर, हमने जाकर,देख लिया !
अभी न कोई गांधी निकला,अभिमानी हरकारों में !

आम, ख़ास और राम पार्टी, देश  बचाने आयीं हैं !
एक बार, दिल्ली पंहुचा दो,हम भी खड़े कतारों में !

भ्रष्टाचार मिटाने आये , आग सभी ने, उगली है !
हमने हाथ  लगाकर देखा , ठंडक है , अंगारों में !

दबी दबी सी ,कुछ चीखें,अब साफ़ सुनाई देतीं हैं !
प्रजातंत्र से भी आशा है, दम भी है, चीत्कारों में !  


रचनाकार परिचय:-


नाम : सतीश सक्सेना 
जन्मतिथि : १५ -१२-१९५४
जन्मस्थान : बदायूं  
जीवनी : जब से होश संभाला, दुनिया में अपने आपको अकेला पाया, शायद इसीलिये दुनिया के लिए अधिक संवेदनशील हूँ ! कोई भी व्यक्ति अपने आपको अकेला महसूस न करे इस ध्येय की पूर्ति के लिए कुछ भी ,करने के लिए तैयार रहता हूँ !  मरने के बाद किसी के काम आ जाऊं अतः बरसों पहले अपोलो हॉस्पिटल में देहदान कर चुका हूँ ! विद्रोही स्वभाव,अन्याय से लड़ने की इच्छा, लोगों की मदद करने में सुख मिलता है ! निरीहता, किसी से कुछ मांगना, झूठ बोलना और डर कर किसी के आगे सिर झुकाना बिलकुल पसंद नहीं ! ईश्वर से प्रार्थना है कि अन्तिम समय तक इतनी शक्ति एवं सामर्थ्य अवश्य बनाये रखे कि जरूरतमंदो के काम आता रहूँ , भूल से भी किसी का दिल न दुखाऊँ और अंतिम समय किसी की आँख में एक आंसू देख, मुस्कराते हुए प्राण त्याग कर सकूं !

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