Jaan Nisar Akhtar with Sahir Ludhianvi
Jaan Nisar Akhtar
मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 8 फ़रवरी, 1914 को जन्मे (कुछ जगह उनकी जन्मतिथि 14 और 18 फरवरी भी दी गई है, मगर हम अमर देहलवी द्वारा संपादित और स्टार पब्लिकेशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘जाँनिसार अख्तर की शायरी’ के आधार पर इसे 8 फ़रवरी मान रहे हैं) जाँनिसार अख्तर का ताल्लुक शायरों के परिवार से था। उनके परदादा ’फ़ज़्ले हक़ खैराबादी’ ने मिर्ज़ा गालिब के कहने पर उनके दीवान का संपादन किया था। बाद में 1857 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ज़िहाद का फ़तवा ज़ारी करने के कारण उन्हें ’कालापानी’ की सजा दी गई। जाँनिसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर खैराबादी’ भी एक प्रसिद्ध शायर थे।

अजय यादवरचनाकार परिचय:-



अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं तथा इनकी रचनायें कई प्रमुख अंतर्जाल पत्रिकाओं पर प्रकाशित हैं।
ये साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में हैं।
जाँनिसार ने 1930 में विक्टोरिया कालेज, ग्वालियर से मैट्रिक करने के बाद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से बी०ए० (आनर्स) तथा एम०ए० की डिग्री प्राप्त की। कुछ घरेलू कारणों से उन्हें अपनी डाक्टरेट की पढ़ाई अधूरी छोड़ ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में उर्दू व्याख्याता के तौर पर काम शुरू करना पड़ा।

1943 में उनकी शादी प्रसिद्ध शायर ’मज़ाज लखनवी’ की बहन ’सफ़िया सिराज़ुल हक़’ से हुई। 1945 व 1946 में उनके बेटों जावेद (मशहूर शायर जावेद अख़्तर) और सलमान का जन्म हुआ। आज़ादी के बाद हुए दंगों के दौरान जाँनिसार ने भोपाल आ कर ’हमीदिया कालेज’ में बतौर उर्दू और फारसी विभागाध्यक्ष काम करना शुरू कर दिया। सफ़िया ने भी बाद में इसी कालेज में पढ़ाना शुरू कर दिया। इसी दौरान आप ’प्रगतिशील लेखक संघ’ से जुड़े और उसके अध्यक्ष बन गए।
बेचैन नज़र, बेताब ज़िगर

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था

मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को
वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था

शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे
कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था

गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह
अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था

पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री
मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था

अश’आर मेरे यूँ तो...
1949 में जाँनिसार फिल्मों में काम पाने के उद्देश्य से बम्बई आ गये। यहाँ वे कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई और मुल्कराज आनंद जैसे लेखकों के संपर्क में आये। उनके संघर्ष के दिनों में सफ़िया भोपाल से उन्हें बराबर मदद करती रहीं। 1953 में कैंसर से सफ़िया की मौत हो गई। 1956 में उन्होंने ’ख़दीजा तलत’ से शादी कर ली। 1955 में आई फिल्म ’यासमीन’ से जाँनिसार के फिल्मी करियर ने गति पकड़ी तो फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। फिल्मों के लिए लिखे गये, उनके कुछ प्रसिद्ध गीत है: ’आँखों ही आँखों में इशारा हो गया’, ’ग़रीब जान के हमको न तुम दगा देना’, ’ये दिल और उनकी निगाहों के साये’, ’आप यूँ फासलों से गुज़रते रहे’, ’आ जा रे ओ नूरी’ आदि। कमाल अमरोही की फिल्म ’रज़िया सुल्तान’ के लिए लिखा गया गीत ’ऐ दिले नादाँ’ उनका आखिरी गीत था।
1935 से 1970 के दरमियान लिखी गई उनकी शायरी के संकलन “ख़ाक़-ए-दिल” के लिए उन्हें 1976 का साहित्य अकादमी पुरुस्कार प्राप्त हुआ। नेहरू जी ने जाँनिसार को पिछले 300 सालों की हिन्दुस्तानी शायरी के संकलन के लिये कहा था जिसे उन्होंने ’हिन्दुस्तान हमारा’ शीर्षक से दो खण्डों में प्रकाशित कराया। 2006 में यह संकलन हिन्दी में पुनर्प्रकाशित किया गया है। 19 अगस्त 1976 को मुंबई में इस महान शायर का निधन हो गया।
जाँनिसार को सादर श्रद्धांजलि देते हुए आइये पढ़ते हैं, उनका ये बेहद प्रसिद्ध गीत:

ऐ दिल-ए-नादां
एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन
अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं
आवाज़ दो हम एक हैं

ये वक़्त खोने का नहीं, ये वक़्त सोने का नहीं
जागो वतन खतरे में है, सारा चमन खतरे में है
फूलों के चेहरे ज़र्द हैं, ज़ुल्फ़ें फ़ज़ा की गर्द हैं
उमड़ा हुआ तूफ़ान है, नरगे में हिन्दोस्तान है
दुश्मन से नफ़रत फ़र्ज़ है, घर की हिफ़ाज़त फ़र्ज़ है
बेदार हो, बेदार हो, आमादा-ए-पैकार हो
आवाज़ दो हम एक हैं

ये है हिमालय की ज़मीं, ताजो-अजंता की ज़मीं
संगम हमारी आन है, चित्तौड़ अपनी शान है
गुलमर्ग का महका चमन, जमना का तट गोकुल का मन
गंगा के धारे अपने हैं, ये सब हमारे अपने हैं
कह दो कोई दुश्मन नज़र उट्ठे न भूले से इधर
कह दो कि हम बेदार हैं, कह दो कि हम तैयार हैं
आवाज़ दो हम एक हैं

उट्ठो जवानाने वतन, बांधे हुए सर से क़फ़न
उट्ठो दकन की ओर से, गंगो-जमन की ओर से
पंजाब के दिल से उठो, सतलज के साहिल से उठो
महाराष्ट्र की ख़ाक से, देहली की अर्ज़े-पाक से
बंगाल से, गुजरात से, कश्मीर के बागात से
नेफ़ा से, राजस्थान से, कुल ख़ाके-हिन्दोस्तान से
आवाज़ दो हम एक हैं!
आवाज़ दो हम एक हैं!!
आवाज़ दो हम एक हैं!!!

3 comments:

  1. जाँनिसार अख़्तर साहब को हार्दिक श्रद्धांजलि!
    - योगेश कुमार

    जवाब देंहटाएं
  2. जान निसार अख्तर बेहतरीन शायर थे। उनकी रुबाइयों की किताब

    एक अनमोल कृति है। उन पर लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा है।

    जवाब देंहटाएं

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