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"माँ गाँव में है" का लोकार्पण [साहित्यिक समाचार]- डॉ प्रेम जनमेजय

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दिविक रमेश के नवीनतम कविता संग्रह "माँ गाँव में है" का लोकार्पण सुविख्यात कथाकार और चिन्तक मैत्रेयी पुष्पा की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर डॉ. अजय नावरिया, प्रताप सहगल, डॉ. जितेन्द्र श्रीवास्तव और प्रेम जनमेजय ने विशेष रूप से विचार व्यक्त किए। सभागार में मदन कश्यप, नवनीत पांडेय, गिरीश पंकज, रमेश तैलंग, सुरेन्द्र सुकुमार, महेन्द्र भटनागर, लालित्य ललित, रूपा सिंह, राजेन्द्र सहगल, राधेश्याम तिवारी सहित अनेक साहित्यकार और पुस्तक प्रेमी उपस्थित थे।

अध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने बताया कि उन्हें संग्रह का शीर्षक बहुत ही अच्छा लगा। माँ गाँव में है कि नहीं, लेकिन हमारी जड़ें गाँव में हैं। उन्होंने कहा कि मुझ कथाकार को शायद इसलिए बुलाया गया है कि मैं गाँव से हूं, गाँव को मानती हूँ, लेकिन मैं कविता पढ़ती हूँ। इसके बाद उन्होंने अपनी पसन्द की कविता के रूप में "बेटी ब्याही गई है" कविता का पाठ किया और काव्यमय टिप्पणी भी की। संचालन प्रेम जनमेजय ने किया। चर्चा प्रारम्भ करते हुए प्रेम जनमेजय ने कहा कि दिविक रमेश हमारे समय के बहुत ही महत्त्वपूर्ण कवि-साहित्यकार हैं। लेकिन कुछ षड़यत्रों के चलते उनके महत्त्व को पूरी तरह रेखांकित नहीं होने दिया गया है। प्रारम्भ में दिविक रमेश ने संग्रह की पहली दो कविताओं “माँ गाँव में है" और "संबंध" का पाठ किया।

अजय नावरिया ने संग्रह के शीर्षक को संवेदन-शील बताते हुए कहा कि इसका एक प्रतीकार्थ यह भी उभरा कि क्या जीवन शक्ति गाँव में है। उनके अनुसार नामवर जी की खासियत और कमजोरी गाँव और गाँव से लगाव है शायद इसीलिए इस संग्रह, जिसके लिए उन्होंने कविताओं का चयन किया है, का ऐसा शीर्षक रखा गया है। जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि दिविक रमेश के पिछले कविता संकलनों से लेकर अब तक के संकलन की कविताओं को देखें तो जो सबसे बड़ी चीज पाएंगे वह है सादगी। ये कविताएं सादगी के सौन्दर्यशास्त्र की कविताएं हैं। इनकी कविताओं में लोक जीवन की विडम्बनाएं हैं, नागर जीवन की विडम्बनाएं हैं और दोनों का द्वन्द्व हमेशा चलता है। किसी भी कविता में चमत्कार की कोशिश नहीं करते। पाठकों के विवेक पर भरोसा रखने वाले कवि हैं।

प्रताप सहगल ने बताया कि जब दिविक रमेश कविता में आए तो अकविता का आक्रामक माहौल था और समानान्तर प्रगतिशील धारा चल रही थी। दिविक रमेश अकविता के आक्रामक माहौल से बाहर आए। अक्रामकता से बेहतर विकल्पों की ओर आए। मैं इनके कवि के प्रति आश्वस्त हूँ। न दिविक रमेश की धार टूटी है और न ही टूटेगी। इससे पूर्व जितेन्द्र अपनी पसन्द की कविता "दैत्य ने कहा", अजय नावरिया ने "एक भारतीय मित्र इनद" और प्रेम जनमेजय ने" मैं ढूँढता जिसे था" का पाठ किया था।

इस अवसर पर दिविक रमेश पर केन्द्रित प्रेम जनमेजय के द्वारा संपादित पुस्तक "दिविक रमेश आलाचोना की दहलीज पर" का भी लोकार्पण किया गया।
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