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जापान की राम कथा [विरासत]



जापान के एक लोकप्रिय कथा संग्रह 'होबुत्सुशू' में संक्षिप्त राम कथा संकलित है। इसकी रचना तैरानो यसुयोरी ने बारहवीं शताब्दी में की थी।१ रचनाकार ने कथा के अंत में घोषणा की है कि इस कथा का स्रोत चीनी भाषा का ग्रंथ 'छह परिमिता सूत्र' है।२ यह कथा वस्तुत: चीनी भाषा के 'अनामकंजातकम्' पर आधारित है, किंतु इन दोनों में अनेक अंतर भी हैं।

अनाम नरेश कथा३ के अनुसार तथागत शाक्य मुनि एक विख्यात साम्राज्य के स्वामी थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी। उसी समय पड़ोसी राज्य 'किउसी' में बहुत बड़ा अकाल पड़ा। लोग भूख से मरने लगे। ऐसी स्थिति में वहाँ के लोगों ने तथागत के राज्य पर आक्रमण कर अन्न प्राप्त करने की योजना बनाई। आक्रमण की जानकारी मिलने पर तथागत की प्रजा दृढ़तापूर्वक उसका सामना करने के लिए तैयार हो गयी।

तथागत को जब आक्रमण की योजना की जानकारी मिली, तब उन्होंने युद्ध में अनगिनत लोगों के मारे जाने की संभावना को देखते हुए अपने मंत्रियों को युद्ध करने से मना कर दिया और स्वयं अपनी रानी के साथ तपस्या करने पहाड़ पर चले गये। तथागत के अचानक चले जाने से वहाँ के योद्धा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। उन लोगों ने बिना युद्ध किये ही शत्रु के समक्ष आत्मसमपंण कर दिया।

राजा पहाड़ पर कंदमूल खाकर तपस्या करने लगे। एक दिन एक ब्राह्मण तपस्वी राजा के पास आया। राजा को उसे देखकर प्रसन्नता हुई। वह राजा के साथ रहकर उनकी सेवा करने लगा। राजा एक दिन पहाड़ पर फल लाने गये. उनकी अनुपस्थिति में ब्राह्मण ने रानी का अपहरण कर लिया। लौटने पर रानी को नहीं देखकर राजा विचलित हो गये। वे रानी की खोज में निकल पड़े। उसी क्रम में उनको एक विशाल मरणासन्न पक्षी से भेंट हुई। उसके दोनों पंख टूटे हुए थे। उसने उन्हें बतलाया का ब्राह्मण सेवक ने रानी का अपहरण किया है। प्रतिरोध कने पर उसने नागराज का रुप धारण कर लिया और उसकी यह दशा कर दी। इतना कहने के बाद पक्षी का प्राणांत हो गया। उसे देखकर राजा द्रवित हो गया। उन्होंने पहाड़ की चोटी पर उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

पक्षी की बात पर विश्वास कर राजा दक्षिण की ओर चल पड़े। उन्होंने रास्ते में हज़ारों बंदरों को गर्जना करते देखा। राजा को देखकर वे प्रमुदित हो उठे। उन्होंने बताया कि जिस पहाड़ पर उनका बहुत दिनों से अधिकार था, उस पर पड़ोसी देश के राजा ने कब्जा कर लिया है। दूसरे दिन दोपहर को युद्ध होना निश्चित है। सारे बंदर राजा को अपना सेनापति बनाना चाहते थे, किंतु राजा युद्ध के नाम से विचलित हो गये। वानरों के अनुरोध पर अंत में उन्हें स्वीकृति देना पड़ी। बंदरों ने उन्हें धनुष-बाण लाकर दिया। निर्धारित समय पर युद्ध आरंभ हो गया। राजा ने पूरी शक्ति से धनुष को ताना। उनके रुप को देखकर ही शत्रु सेना भाग गई। वानर दल में उल्लास छा गया।

राजा ने बंदरों को अपनी पत्नी के अपहरण की बात बतायी। वानर दल उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गये। राजा वानर दल के साथ समुद्र तट पर पहुँचे। अहिंसा धर्म का पालन करने के कारण राजा की दुर्गति को देखकर ब्रह्मा द्रवित हो गये। वे भी छोटा बंदर का रुप धारण कर वहाँ पहुँच गये। लघु कपि ने समुद्र के मध्य स्थित नागराज के भवन तक पहुँचने के लिए बंदरों को लकड़ी और जड़ी-बूटी की सहायता से पुल बनाने के लिए कहा। उसकी सलाह के अनुसार पुल तैयार हो गया।

वानरी सेना सेतु मार्ग से नागराज के भवन के निकट पहुँच गयी। यह देखकर नागराज क्रुद्ध हो गया। बर्फीले तूफान से आहत वानर योद्धा बेहोश हो गये। लघु कपि ने हिमालय से महावटी की शाखा लाकर उनका उपचार किया। उस दिव्य औषधि के प्रभाव से सब में शक्ति का संचार हुआ। नागराज पुन: आग उगलता हुआ आगे बढ़ा, किंतु इस बार राजा के बाण से आहत होकर धाराशायी हो गया। वानरी सेना राजभवन में प्रवेश कर गयी। नाग भवन से रानी की मुक्ति के साथ सात रत्नों की प्राप्ति हुई। राजा रानी के साथ देश लौट गये। उसी समय 'किउसी' के राजा की मृत्यु हो गयी। वहाँ की प्रजा ने भी उन्हें अपना राजा मान लिया। इस प्रकार वे अपने देश के साथ 'किउसी' के भी सम्राट बन गये। 

(साभार - http://www.ignca.nic.in/) 


रेफरेंस: -
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1.     Raghvan, V., The Ramayana in Greater India, P.32
2. Hara, Minoru, Ramayana stories in China and Japan, Asian variations in Ramayana, PP.347-48
3. Hara, Minoru, Fextual theme of Ramayana in Japan, The Ramayana tradition in Asia, PP.341-45 

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